हाईकोर्ट का फैसला धनीराम के घर लाया राहत के पल

Feb 09, 2026 10:00 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, हमीरपुर
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Hamirpur News - हमीरपुर, संवाददाता। मौदहा तहसील के भुलसी गांव के 100 साल के धनीराम को इलाहाबाद

हाईकोर्ट का फैसला धनीराम के घर लाया राहत के पल

हमीरपुर, संवाददाता। मौदहा तहसील के भुलसी गांव के 100 साल के धनीराम को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से बड़ी राहत मिली। हत्या के एक मामले में 1984 में धनीराम, उनके भाई और भतीजे को उम्रकैद हुई थी। भतीजा जमानत पर छूटने के बाद लापता हो गया और भाई की भी मौत हो गई। तीसरे बचे धनीराम ही इस प्रकरण में हाईकोर्ट से अपील पर बाहर थे। उम्र के आखिरी पड़ाव में अब धनीराम को न सुनाई पड़ता है और ही ठीक से दिखता है। हाईकोर्ट से हत्या के आरोप से बरी होने के बाद धनीराम अब अपने जीवन के बचे हुए दिनों को बगैर किसी तनाव के जी सकेंगे।

यह एक ऐसा मामला था, जिसने न सिर्फ उनकी बल्कि उनके पूरे परिवार की जिंदगी को प्रभावित किया था। पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 1982 में जमीन विवाद को लेकर हुए हत्या के एक मामले में 1984 में हमीरपुर सेशंस कोर्ट से धनीराम को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। इस मामले में धनीराम को उसके भाई सत्तीदीन और भतीजे मैकू के साथ दोषी ठहराया गया था। मैकू जमानत पर रिहा होने के बाद फरार हो गया, जबकि सत्तीदीन की अपील के दौरान मौत हो गई। धनीराम जो 1986 से हाईकोर्ट से जमानत पर बाहर थे, अकेले जीवित अपीलकर्ता बचे थे। राजाभैया ने दर्ज कराई थी एफआईआर भुलसी गांव के राजाभैया प्रजापति ने अपने ही सजातीय धनीराम, सत्तीदीन और भतीजे मैकू पर गांव से आठ किलोमीटर दूर एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या का आरोप लगाते हुए मौदहा कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर जांच की और कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। जहां 1984 में तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इस बीच अपील पर छूटा मैकू लापता हो गया और सत्तीदीन की बाद में मौत हो गई। केवल धनीराम ही अपील पर बाहर थे। फैसले से जश्न नहीं, शांति मिली धनीराम के सबसे छोटे पुत्र भुलसी गांव के वर्तमान प्रधान लल्लूराम ने बताया कि उनके पिता को याददाश्त खोने की बीमारी है, लेकिन एक बात उन्हें कभी नहीं भूली कि उनके खिलाफ एक केस चल रहा है। जब हमने उन्हें बताया कि हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है तो वह बहुत खुश हुए। लल्लूराम ने कहा कि हत्या के इस मामले ने सभी की जिंदगी को प्रभावित किया। लोग हमसे बचते थे। शादी-ब्याह करना भी मुश्किल हो गया था, क्योंकि कोई भी हत्या के आरोपी के बेटों से शादी नहीं करना चाहता था। सालों साल वह लोग समाज से कटे जैसे रहे। परिवार के लिए यह फैसला जश्न नहीं, बल्कि एक शांत राहत लेकर आया है। परिवार का 42 साल का इंतजार खत्म हुआ।

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