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जहां यादें नहीं, उस शहर में क्या करने आएं

जहां यादें नहीं, उस शहर में क्या करने आएं

गोरखपुर। क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ ने दाउदपुर स्थित जिस मकान में अंतिम सांस ली, जहां की दीवारें कभी देशभक्ति से महकती थीं, वहां उनकी यादों के कोई निशां नहीं हैं। वहां से चंद मीटर की दूरी पर रहने वाले जनप्रतिनिधियों के साथ ही आम लोगों तक को महान क्रान्तिकारी के विषय में कोई जानकारी नहीं है। शहर में उनकी कोई पहचान न होने पर पूरे परिवार को इसका मलाल है। शचीन्द्रनाथ सान्याल की बुजुर्ग बहू कृष्णा कहती हैं कि सान्याल परिवार की गोरखपुर से कई यादें हैं। घर के सदस्य देश-विदेश में बस गए हैं। लेकिन अच्छा होता कि गोरखपुर में शचीन्द्र नाथ की याद में कुछ होता। शचीन्द्र नाथ की पोती चैताली बागची कहती हैं कि गोरखपुर में कुछ निशान होता तो हमें भी गर्व की अनुभूति होती। गोरखपुर कभी आने का दिल भी नहीं करता है। दाउदपुर में रहने वाली लीना लाहिड़ी कहती हैं कि गर्व होता है कि हम वहां रहते हैं जहां शचीन्द्रनाथ जी ने अंतिम सांसें ली थीं। बीते फरवरी महीने में अंडमान निकोबार गई थीं। वहां शचीन्द्र सान्याल के विषय में काफी कुछ जानने को मिला। वहां से लौटकर उनकी पुस्तक ‘बंदी जीवन को पढ़ा। पिछले 15 साल से दाउदपुर वार्ड से जीत रहे स्थानीय पार्षद संजय यादव को भी शचीन्द्र नाथ सान्याल के बारे कोई जानकारी नहीं है।50 साल की जिंदगी में 20 साल जेल में गुजारे : महान क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल का जन्म 1893 में वाराणसी में हुआ था। बनारस के बंगाली टोला इंटर कालेज से पढ़ाई के दौरान ही 1908 में उन्होंने काशी के प्रथम क्रांतिकारी दल का गठन किया। 50 साल की जिंदगी में उन्होंने 20 साल जेल में गुजारे। अंग्रेज साजिश कर उनका जेल बदलते रहे। 25 केंद्रों की स्थापना की : तत्कालीन होम मेंबर सर रेजिनाल्ड क्रेडक की हत्या के लिए शचींद्र को दिल्ली भेजा गया। यह कार्य असफल रहा। दो तीन महीने बाद काशी लौटते ही शचींद्र गिरफ्तार कर लिए गए। केस चला और शचींद्र को कालेपानी की सजा मिली। फरवरी 1920 में शचींद्र रिहा हुए। इसके बाद उन्होंने रावलपिंडी से लेकर दानापुर तक लगभग 25 केंद्रों की स्थापना कर ली थी। इस दौरान उनकी मुलाकात सरदार भगत सिंह से हुई। 1927 में हुई थी आजीवन कारावास की सजाबेलगांव कांग्रेस के गांधी के क्रांतिकारियों की आलोचना के प्रत्युत्तर में शचींद्र ने महात्मा गांधी को एक पत्र लिखा। गांधी जी ने यंग इंडिया के 12 फरवरी 1925 के अंक में इस पत्र को ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया और साथ ही अपना उत्तर भी। बाद में शचींद्र बंगाल आर्डिनेंस के अधीन गिरफ्तार कर लिए गए। कैद के दौरान ही उनपर 1925 में हुए काकोरी कांड की साजिश का आरोप लगा और अप्रैल 1927 में आजीवन कारावास की सजा दी गई। द्वितीय महायुद्ध छिड़ने के कोई साल भर बाद 1940 में उन्हें फिर नजरबंद कर राजस्थान के देवली शिविर में भेज दिया गया। बाद में कोलकाता जेल भेजे गए। 1943 में गोरखपुर में उनकी मृत्यु हो गई।

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  • Web Title:Where there are no memories what to do in that city