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24 जनवरी, 2020|1:27|IST

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मैं खुद से चल नहीं पाती तो क्या, डॉक्टर बनकर दिखाऊंगी

मैं खुद से चल नहीं पाती तो क्या, डॉक्टर बनकर दिखाऊंगी

मैं खुद से चल नहीं पाती तो क्या... डॉक्टर बनूंगी और दिव्यांगों का इलाज करूंगी। मुझे खुद पर पूरा भरोसा है। अभी 11 वीं कक्षा में हूं और पीएमटी की तैयारी कर रही हूं।

खुशबू ने ये बातें सोमवार को मेडिकल कॉलेज के कम्यूनिटी सेंटर में आयोजित दिव्यांग पुनर्वास शिविर के दौरान सातों जिलों से आए 211 बच्चों के परिजनों से कहीं। उसने कहा कि दिव्यांगता के चलते हम शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं, मानसिक नहीं। हमें अपने उत्साह में कमी नहीं लानी चाहिए बल्कि इससे और दोगुनी ताकत से लड़ाई लड़नी चाहिए।

कम्यूनिटी सेंटर में आयोजित शिविर में एक-एक दिव्यांग की जांच की गई। इसमें कुछ को पुनर्वास केन्द्र में रहने की सलाह दी गई तो कुछ को जरूरी उपकरण दिए गए। साथ ही सभी दिव्यांग बच्चों के परिजनों को ऐसे बच्चों के पालन-पोषण के तरीके भी बताए गए।

मुख्य अतिथि कमिश्नर जयंत नार्लिकर ने खुशबू के जब्जे को देख उसी को मुख्य अतिथि बना दिया और लोगों से अपने अनुभव साझा करने को कहा।

कमिश्नर ने कहा कि शिविर मे आए दिव्यांग बच्चे बेचारे नहीं हैं। ये बच्चे किसी से कम नहीं हैं। इनके साथ लोगों को जरूर संवेदना दिखानी चाहिए। उन्होंने दिव्यांग बच्चों के लिए नि:शुल्क कोचिंग चलाने की बात कही। डीएम ने कहा कि अगर कोई बीमारी होती है तो समय से चिकित्सक के पास जाएं। आज के आधुनिक युग मे हर बीमारी पर अंकुश लगाया जा सकता है। बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार, नेहरू चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जीसी श्रीवास्तव और डॉ. आरएस शुक्ला भी मौजूद रहे।

आज भी लगेगा शिविर: शिविर के संयोजक डॉ. वीके श्रीवास्तव ने बताया कि टीम ने सातों जिलों से दिव्यांग बच्चे शिविर तक पहुंचे हैं। मंगलवार को भी इसी तरह से बच्चों के आने की संभावना है।

बच्चों में कंबल बांटे गए: शिविर में भारतीय स्टेट बैंक की महिला कलब की महिलाओं ने बच्चों में कम्बल बांटे। बांटने वालों में मोनिका चौधरी, पायल, रेखा सिन्हा, मीरा द्विवेदी और स्वेता रहीं।

211 बच्चों का हुआ परीक्षण : शिविर में गोरखपुर एवं देवरिया से आए 211 दिव्यांगजनों का परीक्षण हुआ। इसमें बौद्धिक अक्षमता के 66.6 फीसदी और शारीरिक दिव्यांगता के 33.4 फीसदी बच्चे शामिल थे। 73 दिव्यांगजनों को फॉलोअप के लिए सीआरसी/ डीडीआरसी में बुलाया जाएगा। उपकरण वितरण के लिए समेकित क्षेत्रीय केन्द्र, गोरखपुर द्वारा 27 एवं दिव्यांग कल्याण विभाग द्वारा 28 लाभार्थियों का चयन किया गया है।

11 साल से दिव्यांगता का दंश झेल रहा है निखिल

बेलीपार का रहने वाला निखिल महज दो वर्ष की उम्र में इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ गया था। वह पैर से दिव्यांग हो गया। समय बीतता गया और निखिल की कठिनाइयां बढ़ती ही चली गईं। इन सब के बावजूद उसने हार नहीं मानी और अपने अधिकतर काम वह खुद से कर लेता है। उसने स्कूल में दाखिला भी लिया और सामान्य बच्चों की तरह पढ़ने भी लगा। निखिल के पिता ने बताया कि उन्हें इस शिविर की जानकारी हुई तो यहां चले गए। यहां काफी मदद मिली है। एक महीने बाद यहां जांच के लिए दोबारा बुलाया गया है।

पैर से दिव्यांग है, हौसले में कमी नहीं

भटहट की अनामिका दो साल पहले इंसेफेलाइटिस पीड़ित हो गई थी। तब उसे इसके बारे में कुछ पता नहीं था। जैसे-तैसे काम चल रहा था। अब वह सात साल की हो गई है। स्कूल जाने लगी है। पैर से दिव्यांग होने के बाद भी स्कूल में सामान्य बच्चों की तरह हर काम खुद से करती है और सबसे आगे रहती है। अनामिका के माता-पिता कहते हैं वह दुखी तो हैं कि उसकी बेटी ठीक से चल नहीं पाती है लेकिन खुशी इस बात की है वह हमेशा मुस्कुराती रहती है। परिजनों का कहना है कि शिविर में आकर काफी जानकारी मिली।

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  • Web Title: What if i can t walk by myself i will show as a doctor