top critic parmanand ki duniya sahitye se shuru sahitye par khatm gorakhpur - Hindi Divas Special: चोटी के आलोचक परमानंद की दुनिया साहित्‍य से शुरू साहित्‍य पर खत्‍म DA Image
12 दिसंबर, 2019|11:32|IST

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Hindi Divas Special: चोटी के आलोचक परमानंद की दुनिया साहित्‍य से शुरू साहित्‍य पर खत्‍म

हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार परमानंद श्रीवास्तव की गिनती चोटी के आलोचकों में होती है। 10 फरवरी 1935 को गोरखपुर के बांसगांव में जन्मे परमानंद श्रीवास्तव ने प्रारम्भिक शिक्षा गांव में पाई। सेंट एंड्रयूज कालेज से स्नातक, परास्नातक और पीएचडी की। बाद में वहीं अध्यापक हो गए। कुछ समय बाद वह गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग चले गए। विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ की स्थापना में उनका विशेष योगदान रहा। 

उन्होंने हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका ‘आलोचना’ का सम्पादन भी किया। आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये उन्हें व्यास सम्मान और भारत भारती पुरस्कार भी मिला। आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये वर्ष 2006 में उन्हें के के बिरला फाउंडेशन दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से दो-दो पुरस्कार मिले। लम्बी बीमारी के बाद 5 नवम्बर 2013 को उनका गोरखपुर में उनका निधन हो गया। गोरखपुर विवि में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.अनिल राय कहते हैं-‘परमानंद जी का निधन हिन्दी साहित्य-समाज के साथ गोरखपुर की कला, साहित्य, संस्कृति की दुनिया के लिए बड़ा नुकसान था। उन्हें लगातार याद किया जा रहा है। उनके साहित्यिक एक्टिविज्म की चर्चा हर कहीं होती है। असल में साहित्य के अलावा उनका कोई राग नहीं था, न कोई द्वेष। उनकी दुनिया साहित्य से शुरू होती थी और साहित्य में ही खत्म। 

प्रमुख रचनाएं 
कविता संग्रह- उजली हँसी के छोर पर (1960), अगली शताब्दी के बारे में (1981), चौथा शब्द (1993), एक अनायक का वृतान्त (2004), कहानी संग्रह-रुका हुआ समय (2005), आलोचना-नयी कविता का परिप्रेक्ष्य (1965), हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया (1965), कवि कर्म और काव्यभाषा (1975), उपान्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा (1976), जैनेन्द्र के उपन्यास (1976), समकालीन कविता का व्याकरण (1980), समकालीन कविता का यथार्थ (1980), जायसी (1981), निराला (1985),शब्द और मनुष्य (1988),उपन्यास का पुनर्जन्म (1995),कविता का अर्थात् (1999),कविता का उत्तरजीवन (2004),डायरी-
एक विस्थापित की डायरी (2005),निबन्ध-अँधेरे कुंएँ से आवाज़ (2005) 
 

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