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ऐसे तो नहीं खुल पाएगा हजारों मौतों का राज

मौत की वजह जब सीधे-सीधे नहीं पता चल पाती है तो पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर विसरा सुरक्षित कर लेते हैं। विसरा मतलब मृत शरीर का कुछ अंग जिसकी बाद में फोरेंसिक जांच से मौत की वजह जानी जाती है। 

उपेक्षा
पोस्मार्टम हाउस से लेकर थानों पर हजारों की संख्या में पड़ा है विसरा
मौत की वजह जानने के लिए पीएम के बाद रखा जाता है इन्हें सुरक्षित
जांच के लिए भेजा जाता फोरेंसिक लैब लखनऊ, वहां भी लगता है समय

गोरखपुर में विसरा का हाल काफी खराब है। यहां दस हजार से ज्यादा मौत के राज डिब्बों में बंद पड़े हैं। यह जांच के लिए अब तक भेजे ही नहीं गए। यही नहीं इसमें से ज्यादातर तो अब खराब भी हो चुके हैं। उनका डिस्पोजल भी नहीं कराया गया है। 
गोरखपुर में दस हजार से ज्यादा विसरा मेडिकल कालेज के पोस्टमार्टम हाउस से लेकर विभिन्न थानों पर रखे गए हैं। मेडिकल कालेज में स्थित पोष्टमार्टम हाउस के तीन कमरे तो पूरी तरह से विसरा से ठसा-ठस भरे हुए हैं। ये सभी 2008 के पहले के बताए जा रहे हैं। उसके बाद के ज्यादातर विसरा सम्बंधित थाने पर भेज दिए जाते हैं। जिस थाने से पीएम होता है वहां के सिपाही जार में बंद विसरा उठा ले जाते हैं।

‘‘2008 के बाद पोस्टमार्टम हाउस पर विसरा नहीं रखा जाता है। जिस थाने क्षेत्र से डेडबाडी पोस्टमार्टम के लिए आती है। उसी थानाक्षेत्र के पुलिसवालों को सौंप दिया जाता है। उसके पहले के जो विसरा है अगर 30 साल पूरा हो गए हैं तो उनका डिस्पोजल कराया जाएगा’’। 
डा. सूर्यकांत तिवारी, सीएमओ 

 वहीं जो मौत मेडिकल कालेज में होती है या फिर शव का शिनाख्त नहीं हो पाता है। उसे मेडिकल कालेज के पोस्टमार्टम हाउस में रखा जाता है। जरूरत के हिसाब से विवेचक उसे ले जाते हैं। थानों से भी विसरा जांच के लिए भेजने की स्थित काफी धीमी है। कैम्पियरगंज थाने से पिछले चार महीने में एक भी विसरा नहीं भेजा गया। चिलुआताल थाने में एक विसरा को जांच के लिए भेजने की विवेचक तैयारी कर रहे हैं। अन्य थानों का भी यही हाल है। पोस्टमार्टम हाउस से ले जाकर उसे थाने के मालखाने में सुरक्षित रख दिया जाता है। जांच के लिए उसे ही भेजा जाता जिसका कोर्ट संज्ञान लेती है या फिर हाई प्रोफाइल होता है। 


ऐसे रखा जाता है विसरा 
पोस्टमार्टम के दौरान पीड़ित व्यक्ति प्लास्टिक का जार खरीद कर देता है तो उसमें मृत शरीर का अंग निकाल कर रखा जाता है उसी को विसरा कहते हैं। अंग जल्दी खराब न हो इसके लिए उसे नमक पानी के घोल में रखा जाता है।

90 दिन के बाद हो जाता खराब
विसरा 90 दिन तक ही सुरक्षित रहता है उसके बाद वह खराब हो जाता है। यानी 90 दिन के अंदर अगर जांच के लिए उसे फोरेंसिक लैब भेज दिया गया और वहां जांच हो गई तब तो ठीक है वरना इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है।

15 साल से नहीं हुआ डिस्पोजल 
पहले रेलवे स्टेशन के पास पोस्टमार्टम हुआ करता था तब यहां हजारों की संख्या में विसरा रखा हुआ था। पोस्टमार्टम हाउस जब मेडिकल कालेज गया तो यहां पर रखे गए पुराने समय के विसरा को डिस्पोजल कर दिया गया और नया विसरा नए पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया गया।

हाईप्रोफाइल मामले में ही हो पाती जांच 
विसरा जांच पूरी तरह से विवेचक पर निर्भर करता है। हाईप्रोफाइल मुकदमें जिसमें अफसरों की नजर होती है उसमें विसरा जांच के लिए तो समय से भेज दिया जाता है पर सामान्य मामले में विसरा उसी तरह से पड़ा रहता है और तब तक रखा रहता है जबतक मुकदमा में कोई निर्णय न आ जाए।

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  • Web Title:Thousands of deaths will not be able to open