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28 जनवरी, 2020|3:57|IST

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अपने समय के साहित्य-समाज की कथा है ‘अस्ति और भवति

अपने समय के साहित्य-समाज की कथा है ‘अस्ति और भवति

‘काल का अनुभव नहीं होता, अनुभव का काल होता है। आात्मकथा ‘अस्ति और भवति के एक अध्याय में डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी यह लिखते हैं। यह अध्याय किताब के उस शुरुआती हिस्से में है, जिसमें वह अपने पुरखों के बारे में बता रहे हैं। मां की मौत कैसे एक बुजुर्ग हो रहे बच्चे को झकझोरती है, यह अनुभव काल की परिभाषा बन जाता है। कहने को यह आत्मकथा है पर इसमें उनके समय के साहित्य-समाज की कथाएं भी समानांतर चल रही हैं।

भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी में आत्मकथाओं का सिलसिला तेज हुआ है। बीते दशकों में तमाम आत्मकथाएं आईं। ‘अस्ति और भवति उनके बीच अपने अलग रंग-ढंग की आत्मकथा है। इसमें घटनाएं कम हैं, विचार ज्यादा। कहीं दर्शन झलकता है कहीं संस्कृति। मानव मन की कमजोरियां झांकती हैं तो कहीं सत्ता और राजनीति के दुखांत-सुखांत किस्से भी बयां होते हैं।

मूर्तिदेवी सम्मान की सीमा केवल हिन्दी की परिधि पर खत्म नहीं होती। यह 22 भारतीय भाषाओं में पिछले दस वर्ष में लिखी गई दर्शन और संस्कृति की कृतियों के लिए दिया जाता है। समझा जा सकता है कि एक हिन्दी लेखक की आत्मकथा मूर्तिदेवी सम्मान के लिए कैसे चुनी गई होगी? डॉ. तिवारी कहते हैं, ‘दुनिया में सबसे बड़ा ज्ञान आत्मज्ञान ही है। तुलसी मानस की शुरुआत में भवानी शंकर की वंदना करके स्वयं को जानने की शुरुआत ही तो कर रहे हैं। उन्होंने ‘अस्ति और भवति की शुरुआत तुलसी के ‘भवानी शंकरौ बंदे... श्लोक से ही की है। ‘अस्ति और भवति एक वैचारिक कृति है। इसमें भारतीय संस्कृति और आधुनिक विज्ञान मिले-जुले हैं। भारतीय संस्कृति का वैज्ञानिक आधार पर परीक्षण करती यह किताब 425 पन्नों में देश-दुनिया की तमाम घटनाओं, उनके दौर के लेखन, उनके शहर और गांव के साथ उनके पुरखों के दर्शन कराती हुई चलती है।

किताब में इमरजेंसी पर एक अध्याय है, जिसमें लेखकों पर सत्ता के जुल्म का जिक्र है। उन्होंने खुद अपने डर का भी जिक्र किया है। घर के बाहर कोई गाड़ी रुकने पर ‘पुलिस तो नहीं आ गई की आशंका का अनुभव दर्ज किया है। इससे पहले शुरुआती 50 पन्नों पर अपने पुरखों की यादें सहेजी हैं।

‘अस्ति और भवति जिस रवानी और रफ्तार से चलती है, उससे पाठक के सामने दृश्य खिंचते हैं। यह उस वक्त की तमाम बातों के इशारे करते हैं। कहीं खुल कर बोलते हैं, कहीं खामोशी से निकल भी जाते हैं। इसमें एक उक्ति का जिक्र है, ‘चुप रहना केवल न बोलना नहीं होता, यह बोलने से इनकार करना भी होता है। आत्मकथा में 2013 तक की घटनाएं हैं। उसी वर्ष डॉ. तिवारी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बने थे। किताब का अंतिम वाक्य जेहन में गड़ जाने वाला है।

‘एक अंधेरे से शुरू हुई थी मेरी यात्रा और मैं खो जाता एक दूसरे अंधेरे में, गुमनाम। मैंने अपने संदेह, मोह और भ्रम को प्रकाशित किया-इस अपराध के लिए क्षमा।

इस अंतिम वाक्य से ठीक पहले डॉ. तिवारी लिखते हैं-अपनी लोकयात्रा में बहुतों को जान-अनजान में दुखी किया होगा मैंने। मनुष्य के साथ चर और अचर भी होंगे उनमें। अंतिम इच्छा है कि उन सबके चरणों पर माथा रखकर क्षमा याचना कर लूं।

साहित्यिक-असाहित्यिक सैकड़ों-हजारों शिष्यों के गुरु की आत्मकथा इस बिंदु पर आकर उन सभी की आंखों को नम कर देती है।

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  • Web Title:The story of literature and society of its time is Asti and Bhavati