DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

डोहरिया में वीरों की शहीद स्थली पर अव्‍यवस्‍था का राज, आज दी जाएगी श्रद्वांजलि

आजादी के लिए आवाज उठाने पर जालिम अंग्रेजों ने भारतीयों पर कितने जुल्म ढाये, डोहरिया कला इसका जीता जागता उदाहरण है। आजाद देशों में, गुलामी के दौर की ऐसी घटनाओं के सबूत, स्मारकों के रूप में संरक्षित किए जाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां आजादी की कीमत को समझ सकें। स्मारक हमने भी बनाए लेकिन देखरेख न होने की वजह से वे उद्देश्यहीन होते जा रहे हैं। 

‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के महात्मा गांधी के एलान पर ‘करो या मरो’ का नारा लगाते हुए 23 अगस्त 1942 को सहजनवां के डोहरिया कला में आजादी के दीवानों ने जालिम हुकूमत की पुलिस से सीधा मोर्चा लिया था। सीने पर गोलियां खाकर नौ रणबांकुरे शहीद हो गए लेकिन आज जिम्मेदारों की उपेक्षा ने उनकी शहादत स्थली का बुरा हाल बना दिया है। 
टूटे दरवाजे, दीवारों से उखड़ते मार्बल, टूटी ग्रिल, झाड़ झंखाड़ और गंदगी तो लम्बे अर्से से स्मारक की पहचान बने हुए थे। कोई रोक-टोक न होने के चलते अब यहां नशेड़ियों और जुआरियों  की भी आवाजाही होने लगी है। परिसर में जगह-जगह पड़ीं शराब और बीयर की बोतलें इसकी गवाही दे रही हैं। 

बदहाल विरासत
डोहरिया में वीरों की शहीद स्थली पर अव्यवस्था का राज
-गांधीजी के ‘करो या मरो’ नारे पर मर मिटे थे नौ रणबांकुरे 
-23 अगस्त 1942 को सीने पर झेलीं थीं जालिम अंग्रेजों की गोलियां
-स्मारक स्थल पर जगह-जगह बिखरी हैं शराब, बीयर की बोतलें
-झाड़-झंखाड़ और गंदगी का राज, पशुओं का चारागाह बना
-टूटे दरवाजे, दीवारों से उखड़ते मार्बल, टूटी ग्रिल बनी पहचान
 

‘हिन्दुस्तान’ संवाद की पड़ताल में स्मारक के वाचनालय का मुख्य दरवाजा टूटा मिला। भवन में लगी ग्रिल और शीशे भी टूटे मिले। वाचनालय के अंदर और बाहर के दरवाजे भी टूटे मिले। बाहर लगा इंडिया मार्क टू हैंडपम्प खराब था। परिसर में जगह-जगह गड्ढे और स्मारक भवन का मार्बल जगह-जगह से उखड़ता मिला। स्मारक परिसर में घास चरते पशु दिखे और चारों तरफ गंदगी के अम्बार भी। 

सिर्फ चार दिन दिखती है हलचल 
डोहरिया कला शहीद स्मारक पर सिर्फ 15 अगस्त, 23 अगस्त, 26 जनवरी और दो अक्टूबर को ही हलचल दिखती है। इन दिनों में परिसर की साफ-सफाई होती है। शहीदों को याद किया जाता है। बाकी दिनों में कोई सुध लेने नहीं आता। सामान्य दिनों में सफाई कर्मचारी भी थोड़ी देर के लिए आते और बैठ कर चले जाते हैं। 

सांसदों-विधायकों ने निधि से दिया धन
डोहरिया कला स्मारक के विकास के लिए कई जनप्रतिनिधियों से धन दिया। इससे स्मारक में वाचनालय, सभागार, स्तूप और चहारदीवारी बनी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भृगुमुनि मिश्र और मुरारी इंटर कालेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य सत्यवान सिंह की मांग और तत्कालीन विधायक टी.एन.मिश्र के प्रयासों से वर्ष 1980-90 में 12 लाख रुपए मंजूर किए गए। उसके बाद विधायक टी.पी.शुक्ल के प्रयासों से चार लाख रुपए स्मारक के लिए जारी हुए। गोरखपुर के सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ (मौजूदा मुख्यमंत्री) ने सांसद निधि से सभागार और वाचनालय कक्ष का निर्माण कराया। पूर्व विधायक यशपाल रावत ने सहजनवां थाना चौराहे पर डोहरिया कला के शहीदों के नाम पर एक भव्य गेट बनवाया। 

ऐसे हुआ था डोहरिया कांड 
महात्मा गांधी ने आठ अगस्त 1942 की शाम मुंबई में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ दिया। इन नारों ने देश का सियासी माहौल अचानक काफी गर्म कर दिया। नौ अगस्त 1942 को डोहरिया कला में भी आजादी के दीवानों ने ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए संघर्ष का बिगुल फूंक दिया। डोहरिया कला में 23 अगस्त 1942 को सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे। तत्कालीन कलेक्टर एम.एम.मास, हाकिम परगना साहब बहादुर और इंस्पेक्टर हल्का सदर ने लोगों को हटाने की पूरी कोशिश की। लेकिन आजादी के दीवाने लगातार नारे लगाते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे। इसके बाद तत्कालीन थानेदार एनुलहक ने हथियारों से लैस सिपाहियों को बुला लिया। पुलिस निहत्थे सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज करने लगी। जवाब में भीड़ ने भी पत्थरबाजी शुरू कर दी। इसके बाद पुलिसवालों ने फायरिंग कर दी। लोगों ने सीने पर गोलियां झेलीं। नौ आंदोलनकारी शहीद हुए। 23 गंभीर रूप से घायल हो गए। बताते हैं कि उस दिन अंग्रेजों ने डोहरिया कला गांव में आग भी लगा दी थी। 

पर्यटन विभाग ने कहा, जल्द होगा सौन्दर्यीकरण
क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी रविन्द्र कुमार मिश्र ने बताया कि 24 मई 2018 को डोहरिया कला के सौन्दर्यीकरण का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। करीब 80 लाख की लागत से स्मारक स्थल पर पर्यटकों के लिए शेड, बेंच, पेयजल आदि की व्यवस्था कराई जाएगी। स्मारक स्थल की अन्य व्यवस्थाओं को भी ठीक किया जाएगा। 

‘‘वीरों की शहीद स्थली का निवासी होने के नाते हमें गर्व है। लेकिन इस स्मारक की हालत देखकर बहुत दु:ख होता है।’’
जटाशंकर

‘‘दो-तीन महत्वपूर्ण दिनों को छोड़कर कोई इस स्मारक की सुध नहीं लेेता। स्मारक को अच्छा बनाना बहुत जरूरी है।’’
पार्वती

‘‘स्मारक की उपेक्षा बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां के निवासियों को इससे बहुत दुख होता है।’’
ध्रुप राज पांडेय 

‘‘स्मारक ऐसा होना चाहिए कि यहां जो लोग आएं उन्हें डोहरिया कला का इतिहास पता चले। लोग यहां कुछ वक्त गुजारना चाहें।’’
रामप्रकाश 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:The secret of disorder on the martyrs place in the city of Doharia