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9 अप्रैल, 2020|4:05|IST

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व्यंग्य के बाण चलते थे लेकिन संगीत से दूर नहीं हुई

व्यंग्य के बाण चलते थे लेकिन संगीत से दूर नहीं हुई

छोटी उम्र में शादी, घर की जिम्मेदारी, तमाम मुश्किलें लेकिन गीत और संगीत के लिए ऐसा जज्बा कि अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा लोकगायिका उर्मिला शुक्ला ने स्वस्थ भोजपुरी लोकगायन को सौंप दिया। उर्मिला शुक्ला को भोजपुरी गायन के लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो उनके चेहरे पर खुशी झलकने लगी और बोली कि देर से ही सही सरकार ने मेरी मौजूदगी तो मानी...।

उम्र के 75 बसंत पार चुकी गायिका उर्मिला शुक्ला आज भी जब गीत संगीत की बात करती हैं तो चहक उठती हैं। बात करते हुये उन्होंने ‘खाए के रूखा सूखा सुते के मचान रे अतिथि पहुनवा के बड़ा सनमान रे गीत गुनगुनाया। भोजपुरी लोकगीतों की परम्परा का निर्वाहन करने वाली उर्मिला शुक्ला ने कहा कि मेरे पिता पं. शशिकांत शुक्ल और ससुर परमानन्द शुक्ला नामी साहित्यकार रहे। घर में उस दौर के बड़े साहित्यकारों का आना जाना रहा। नये-नये गीतों पर चर्चा होती थी तो दूसरे कमरे की दीवार पर कान लगाकार उन साहित्यिक रचनाओं को सुनती थी, इसलिए अच्छा साहित्य हमेशा जहन में रहा और वैसे ही गीत गाये। हालांकि उर्मिला शुक्ला वर्तमान भोजपुरी गीतों से थोड़ा नाखुश जरूर रहती हैं लेकिन साथ ही कहती हैं कि स्वरूप जो बिगड़ा है वो कुछ लोगों की वजह से बिगड़ा है। अधिकतर गायक आज भी अच्छे हैं। बस नये गायक अच्छे रचनाकारों की गीतों को गाना शुरू करें तो स्थिति और बेहतर होगी।

खुद बनाती हूं धुन : भारत के तमाम शहरों के साथ ही विदेशों में अपनी माटी की सुंगध भोजपुरी गीतों के माध्यम से फैलाने वाली उर्मिला कहती हैं कि बहुत कम उम्र में जब दूसरे बड़े कलाकारों को सुनती थी तो दिल से आवाज आती थी कि मैं ये कर सकती हूं और जब आकाशवाणी में साल 1975 में स्वर परीक्षा दी तो कम्पोजर हरीराम द्विवेदी ने पूछा कि कैसी रही स्वर परीक्षा तो मैंने बोला की पास हो गई, द्विवेदी जी ने कहा कि अरे परीक्षाफल तो आने दो। कुछ दिन पर रिजल्ट आया तो मेरा नाम उसमें शामिल था। पुराने दिनों की यादों में खोई उर्मिला शुक्ला ने कहा कि जब कोई गीत सुनती थी तो उसकी धुन खुद ही बनाती थी। बस हारमोनियम हाथ में हो मेरे तो कोई भी धुन फौरन तैयार कर दूं। शहर के बेतियाहाता में रहने वाली उर्मिला शुक्ला ने कनाडा, न्यूयार्क, हैमिल्टन, वाशिंगटन, मैक्सिको, थाईलैंड व अन्य देशों में प्रस्तुतियां दी हैं।

लालटेन की रोशनी में लिखे गीत

उर्मिला शुक्ला ने विदेश में प्रस्तुतियां दी हैं, बड़े शहरों में गाने गाये हैं। अंग्रेजी, हिन्दी और फारसी भी बोलती है लेकिन दिल में पढ़ाई नहीं कर पाने का दर्द आज भी हैं। उन्होंने कहा कि उस दौर पता नहीं ऐसा क्या था कि लड़कियों को पढ़ाया ही नहीं जाता था, लेकिन मुझे पढ़ने का शौक हमेशा से था। मेरी एक दोस्त थी जो मेरे सामने पढ़ती थी तो मैं लालटेन की लाइट में कुछ नहीं तो गीत लिखना शुरू कर देती थी। बाद में वो दोस्त चिकित्सक बनी। उर्मिला शुक्ला संगीत में प्रभाकर हैं। उर्मिला शुक्ला ने अपनी चारों बेटियों को खूब पढ़ाया और अपनी संगीत विरासत भी उन तक पंहुचायी। परम्परा और विरासत की बात हुई तो उर्मिला शुक्ला ने ‘अंगनवा कागा काहे बोले. का जानी के आवे वाला तनिको मरम ना खोले गीत गा दिया।

आलोचनाओं की फिक्र नहीं की

उर्मिला शुक्ला ने जिस दौर में गीत गाना शुरू किया उस दौर में लड़कियों का घर से बाहर निकलना ही बड़ी बात होती थी। उर्मिला शुक्ला को घर का तो सहयोग मिल रहा था लेकिन जब घर से बाहर निकलती थी तो ताने मारने वालों की कमी नहीं थी। मोहल्ले के लोग कहते थे कि ये देखो तबला और सारंगी बजाएंगी। लेकिन इन आलोचनाओं की कभी फिक्र नहीं की।

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  • Web Title: The sarcasm was moving but the music did not get away