The ancient historical Munjeshwaranatha Shiva temple of Bhayvapar, center of faith - आस्था का केन्द्र भौवापार का प्राचीन एतिहासिक मुंजेश्वरनाथ शिव मंदिर DA Image
17 नबम्बर, 2019|9:58|IST

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आस्था का केन्द्र भौवापार का प्राचीन एतिहासिक मुंजेश्वरनाथ शिव मंदिर

राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से जागरूक होने के साथ साथ इस गांव की मिट्टी में और यहां के बाशिंदो में धर्म और संस्कृति भी रची बसी है। भौवापार स्थित मुंजेश्वरनाथ  मंदिर इसी सांस्कृतिक धार्मिक धरोहर का एक अंश है जो अपनी ऐतिहासिकता एवं मान्यता के चलते लोगों में श्रध्दा और विश्वास का प्रतीक बन चुका है।
मन्दिर का कोई एक मुख्य पुजारी नही है। मन्दिर के बगल की जमीन गिरि परिवार को दे दिया गया है। वर्तमान में लगभग 30 परिवार दिन वार मन्दिर की व्यवस्था को देखते हैं। लगभग 600 वर्षों से खुले आसमान के नीचे मुञ्जेश्वर नाथ जी भक्तो की आस्था और विश्वास के केन्द्र बने हुए हैं।

गोरखपुर जनपद से 13 किमी दूर दक्षिण मे स्थित एतिहासिक गांव भौवापार

ऎसा माना जाता है कि जब-जब लोगो ने छत लगाने का प्रयास किया छत टूट गया। ऎसा करने वालो को नुकसान उठाना पड़ा! लोगो को यह विश्वास है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर मन की सभी मुरादें पूरी होती है! 


किवदंती: मुंज की झाड़ियो से निकले थे मुञ्जेश्वर नाथ
शिवलिँग के विषय में अनेक किँवदंतियां प्रचलित हैं ,लेकिन "नाग कौशलोत्तर" नामक प्राचीन ग्रंथ मेँ लिखा गया है कि खेत जोतते समय मजदूरों के फावड़े से ज्यों ही पत्थर पर चोट लगी। वहां से दूध की धारा बहने लगी। सतासी नरेश महाराज मुंज ने मूर्ति को अन्यत्र ले जाने का प्रयास किया परन्तु वे सफल नहीँ हुए। दूसरे दिन स्वप्न मेँ भगवान अनादि देव शिव शंकर ने कहा कि मेरे लिए मंदिर और जलाशय एवं पुजारियोँ के जीविकोपार्जन हेतु अगल बगल जमीन दे दो। मैँ यही निवास करूंगा। स्वप्न के अनुसार राजा ने अगल -बगल की सारी जमीन मंदिर परिसर को दे दी । मंदिर और जलाशय आदि का निर्माण कराये , इसीलिये राजा मुंज के नाम पर कालान्तर मेँ यह मंदिर मुंजेश्वरनाथ (भौवापार) के नाम से विख्यात हो गया ।

जनश्रुति- क्षत्रिय राजा मुंज के नाम पर पड़ा मुञ्जेश्वर नाथ मन्दिर 
एक दूसरी किवदंती है कि भौवापार में भर राजाओ का शासन था,खेती के लिए मुंज की झाडियों को साफ कराया जा रहा था, मजदूरो का फावड़ा अचानक एक पत्थर से टकराया और रक्त धारा बहने लगी, मजदूरों मे भगदड़ मच गया! रात को भर राजा के स्वप्न मे शिव जी ने दर्शन दिया और मन्दिर बनाने की बात कही, अगले ही दिन से मुंज की झाड़ियो को साफ कर पूजा अर्चना शुरू कर दिया गया, धीरे धीरे मन्दिर निर्माण हुआ, मूंज की झाड़ियो से निकलने के कारण ही मन्दिर का नाम मुञ्जेश्वर नाथ पड़ा!

यह भी सुनने मे आता है कि भौवापार में राज कर रहे भर राजा की रानियो और उनवल के क्षत्रिय राजा की रानियों मे पहले पूजा करने की बात को लेकर झगड़ा भी हो चुका था। इस झगड़े के कारण उनवल के राजा ने भौवापार के भर राजाओ से युद्ध कर उन्हे पराजित किया और भौवापार पर अपना अधिकार किया।

सभी मनौतियां होती हैं पूरी
 भगवान अनादि देव शिव की असीम कृपा से श्रध्दालुओँ की हर प्रकार की मनौती यहां पूरी होती है। 20 एकड़ में स्थित मुंजेश्वर नाथ के प्रांगण में विशाल शिव सरोवर के साथ राम-जानकी मन्दिर, हनुमान मन्दिर, गणेश मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, पार्वती मन्दिर, संतोषी माता मन्दिर,  काली माता मन्दिर,  साईं बाबा मन्दिर भक्तो द्वारा स्थापित किया गया है। 

लगता है विशाल मेला
इस पवित्र भूमि पर महाशिवरात्रि, दशहरा ,तथा अधिक मास के अवसर पर विशाल मेला लगता है तथा प्रत्येक सोमवार को हजारो नर-नारी भूतनाथ अनादि देव शिवशंकर को नमन करते हैं एवं मनौतियां चढ़ाते हैं।        
1972 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इरिक स्ट्राइक भारतीय इतिहास पर अध्ययन करते हुए जब भौवापार पहुंचे। तब मुजेश्वर नाथ को देख उन्होंने कहा कि था कि यह अलौकिक देव की नगरी है। यहां नन्दी है, गणेश है साक्षात शिव भी हैं।

   

 और जब पहले पूजा करने की जिद खून के प्यासे हुए राजा                         
भौवापार शिव मंदिर से सम्बन्धित एक एतिहासिक घटना भी है। इसका जिक्र दानपाल सिंह की "गोरखपुर परिक्षेत्र का इतिहास" में जिक्र है जिसमें श्रीनेत वंशावली की उन्होंने चर्चा की है। शिव मंदिर से सम्बन्धित घटना उनवल स्टेट की रानी को एक लड़का पैदा हुआ। जिसका नाम होरिल सिंह रखा गया जिसके बारे में विद्वान ज्योतिषियों ने बताया कि यह बालक अभुक्त मूल नक्षत्र में पैदा हुआ है। इसका मुख राजा को देखना एक निश्चित समय तक अनिष्टकारी होगा। इसलिए रानी को बालक के साथ सतासी स्टेट के राजा संग्राम सिंह थे (रुद्रपुर स्टेट) उनके पास भेंज दिया गया ।
रुद्रपुर सतासी, उनवल, बांसी ये  स्टेट एक ही खानदान से ताल्लुक रखते हैं। शिव रात्रि की बात है भौवापार शिव मंदिर पर बहुत भारी मेला लगता था। शिव रात्रि बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। उनवल स्टेट की रानी भी शिव रात्रि व्रत रखती थीं। वो भौवापार शिव मंदिर पर भगवान मुन्जेश्वरनाथ जी का दर्शन करने आई लेकिन राजा भर के सैनिको ने उन्हे रोक दिया। उनका कहना था जब राज परिवार दर्शन कर लेगा तभी आपको इजाजत मिलेगी। रानी ने परिचय दिया लेकिन उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। वो वापस लौट गई और राजा उनवल स्टेट के राजा के पास पत्र भेजा या तो वो दर्शन कराए या तो वो व्रत तोड़ देंगी। नाराज होकर उनवल स्टेट और रुद्रपुर सतासी स्टेट राजा संग्राम सिंह के नेतृत्व में हमला कर के राजा भर को मार डाला। इस हमले में भौवापार के क्षत्रियों ने भी मदद किय। बालक होरिल सिंह को भौवापार का राजा घोषित किया गया। उसके बालिक होने तक राजा संग्राम सिंह को कार्यवाहक बनाए गए। यह घटना अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल के निकट की मानी जाती है। 

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