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18 जनवरी, 2021|6:35|IST

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आत्मनिर्भर बनने के लिए जेल में हुनर सीख रहे बंदी

आत्मनिर्भर बनने के लिए जेल में हुनर सीख रहे बंदी

गोरखपुर। वरिष्ठ संवाददाता

यूपी की जेलें सिर्फ सजा काटने के लिए ही नहीं बल्कि बंदियों को आत्मनिर्भर बनाकर मुख्य धारा में शामिल करने की दिशा में भी काम कर रही हैं। इन दिनों बंदियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कोई प्लम्बर का काम सीख रहा है तो कोई इलेक्ट्रिशियन बनने की राह पर है। जेल अफसरों के मुताबिक यह हुनर रिहाई के बाद उनके काम आएगा।

प्रदेश की कई जेलें कुछ मामलों में आत्मनिर्भर हैं। किसी जेल में बंदी अपनी उगाई सब्जी खाते हैं तो कहीं डेयरी चल रही है, वहां दूध नहीं खरीदना पड़ता है। वहीं सिलाई कर बंदी खुद के लिए कपड़े भी बना रहे हैं। कोराना काल में पूर्वांचल की जेलों से बड़ी संख्या में मास्क तैयार कर अस्पतालों तक पहुंचाए गए। अब बंदियों को जेल से बाहर निकलने के बाद वह अपराध में दोबारा कदम न रखें इसके लिए आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। उनकी योग्यता और रुचि के मुताबिक कौशल विकास योजना के तहत ट्रेनिंग दी जा रही है। गोरखपुर-देवरिया और बस्ती जेल में प्लम्बर और इलेक्ट्रिकल ट्रेड की ट्रेनिंग दी जा रही है तो वहीं गोरखपुर में सजावटी झालर, ट्यूब लाइट, झूमर, प्लम्बर के काम की ट्रेनिंग या तो दी जा रही है या फिर दी जा चुकी है।

महोत्सव में उत्पादों की प्रदर्शनी लगेगी

गोरखपुर जेल के 20 बंदियों को गीडा की एक कंपनी ने बीते दिनों सजावटी झालर, ट्यूब लाइट, झूमर बनाने की ट्रेनिंग दी। कंपनी ने बंदियों को कच्चा माल भी मुहैया कराया है। बंदियों की बनाई झालरों की गोरखपुर महोत्वस में प्रदर्शनी लगाने की भी तैयारी है। इससे पहले प्रधानमंत्री कौशल मिशन के तहत बंदियों ने प्लम्बर के कार्य का प्रशिक्षण लिया है। वहीं इलेक्ट्रिकल का प्रशिक्षण अभी जारी है।

सिलाई का काम भी कर रहे हैं कैदी

सिलाई का काम कर न सिर्फ खुद को पूरे दिन व्यस्त रख रहे हैं बल्कि उसी से अपनी घर-गृहस्थी भी चला रहे हैं। वर्ष 2019 में गोरखपुर के कैदियों ने 10 हजार से ज्यादा कुर्ता-पजामा और जंघिया की सिलाई की है। इनके सिले हुए कुर्ता-पजामा की गोरखपुर ही नहीं, प्रदेश के अन्य जेलों के कैदियों में डिमांड है। गोरखपुर जेल से ही अन्य जेलों को भी सप्लाई दी जाती है। 16 महिला तथा 38 पुरुष कैदियों ने सिलाई का काम सीखा है। उन्होंने इसके लिए जेल में भी संस्था के जरिये सिलाई की ट्रेनिंग ली है और जेल में इनके लिए सिलाई मशीनें लगाई गई हैं। इन्हें दिन के हिसाब से 40 रुपये मेहनताना भी दिया जाता है। सिलाई की यह कमाई से कैदी अपने घर भेजते हैं। जेल की कमाई से इनमें से कुछ कैदियों की घर की गृहस्थी भी चल रही है। वे महीने दो महीने में एकत्र पैसा घर भेजते हैं। यही नहीं कुछ कैदी ऐसे भी हैं जिनके बच्चों की पढ़ाई में यह रकम योगदान दे रही है।

बंदियों को स्वरोजगार मुहैया कराने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। इससे वह जेल से छूटने के बाद खुद को आत्मनिर्भर बनाते हुए अच्छी कमाई कर सकें और सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। कौशल विकास योजना के साथ ही अन्य संस्थाओं के माध्यम से बंदियों को लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

- डॉ. रामधनी, वरिष्ठ जेल अधीक्षक

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  • Web Title:Prisoners learning skills in prison to become self-sufficient