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करोड़ों खर्च होने के बाद भी मरीजों को नहीं मिल रहा इलाज

करोड़ों खर्च होने के बाद भी मरीजों को नहीं मिल रहा इलाज

मरीजों के इलाज के नाम पर खोले गए सरकारी अस्पताल ही बीमार है। करीब 90 सरकारी अस्पतालों में 1300 बेड हैं। इनके संचालन के लिए हर साल करीब 500 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इसके बावजूद जिले में मरीजों को अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं।

वार्ड से लेकर ऑपरेशन थिएटर तक में गंदगी पसरी है। मरीजों को दवाएं नहीं मिल रहीं। स्पेशियलिस्ट के ज्यादातर पद रिक्त हैं। स्थिति यह है कि ज्यादातर अस्पताल सफेद हाथी बनकर रह गए हैं। इंसेफेलाइटिस से जूझ रहे जिले में 23 इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर संचालित हैं। इस साल अब तक उनमें इंसेफेलाइटिस का कोई मरीज भर्ती नहीं हुआ है। सिर्फ तेज बुखार के करीब 200 मरीजों का इलाज हो सका है।

सीएचसी-पीएचसी पर गर्भवतियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। खास तौर पर उन्हें जो कि हाई रिस्क प्रेगनेंसी के दायरे में आती हैं। इसके लिए लिए जिले में संचालित तीन फर्स्ट रेफरल यूनिट में से दो सिर्फ कागजी ही रह गए हैं। सरकारी अस्पतालों में कम हो रहे सिजेरियन इसकी तस्दीक कर रहे हैं।

जिला अस्पताल में भी नहीं हैं विशेषज्ञ

जिला अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन, नेफ्रोलॉजिस्ट, फिजिशियन समेत डॉक्टर, स्टाफ नर्स और कई पद रिक्त हैं। न्यूरोलॉजिस्ट और यूरोलॉजिस्ट की आज तक नियुक्ति नहीं की गई है। 305 बेड वाले जिला अस्पताल में 52 डॉक्टरों के पद हैं लेकिन इसके बावजूद 28 डॉक्टर ही रखे गए हैं। अस्पताल में एनेस्थिसिया का सिर्फ एक डॉक्टर हैं वह भी संबद्ध। इसके कारण मरीजों को ऑपरेशन के लिए डेढ़ महीने की वेटिंग मिल रही है।

महिला अस्पताल भी है बदहाल

205 बेड वाले जिला महिला अस्पताल की भी कमोबेश यही स्थिति है। महिला अस्पताल में डॉक्टरों के कुल 18 पद स्वीकृत है, जिसमें से वर्तमान में 10 डॉक्टरों की ही तैनाती है। यह अस्पताल भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। अस्पताल में रात में सिजेरियन नहीं होता। रेडियोलॉजिस्ट के भी दो पद रिक्त हैं।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। इसके बावजूद मरीजों के बेहतर इलाज की कोशिश की जा रही है। जो संसाधन मौजूद हैं उसी में सबसे बेहतर कार्य किया जा रहा है।

डॉ. डीके सोनकर,एसआईसी, महिला अस्पताल

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  • Web Title:Patients are not getting treatment after crores of expenditure