Paper made from moss sanitary pads will be usable many times - काई से बनाया कागज, कई बार प्रयोग लायक होगा सेनेटरी पैड DA Image
15 दिसंबर, 2019|2:52|IST

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काई से बनाया कागज, कई बार प्रयोग लायक होगा सेनेटरी पैड

काई से बनाया कागज, कई बार प्रयोग लायक होगा सेनेटरी पैड

मेरठ के सरधना की रहने वाली 12वीं की छात्रा निदा ने एल्गी यानी काई से कागज बनाने में सफलता पायी है। उसने रंग बिरंगे कागज तैयार किए हैं। खुशी का दावा है कि धान के खेतों में काई खूब होती है। किसान काई जमा कर इसे आय का साधन बना सकते हैं। मेरठ की ही 11वीं की छात्रा खुशी ने ऐसा सेनेटरी पैड बनाया है, जो बार-बार प्रयोग किया जा सकेगा। इसकी कीमत कम होगी, यह गरीब महिलाओं के लिए उपयोगी साबित होगा।

ऐसी ही अपनी नयी खोज के साथ करीब तीन सौ स्कूली बच्चे गोरखनाथ क्षेत्र के आरपीएम एकेडमी ग्रीन सिटी में बाल विज्ञान कांग्रेस में भाग लेने आए हैं। इनके प्रोजेक्ट देख कर यह तय करना मुश्किल है कि कौन श्रेष्ठ है। सभी ने कुछ न कुछ नया खोजा व अध्ययन किया है।

27 वें बाल विज्ञान कांग्रेस का शुभारंभ बुधवार को मंडलायुक्त जयंत नर्लिकर और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डॉ. वेदपति मिश्र के हाथों हुआ। बतौर मुख्य अतिथि मंडलायुक्त ने कहा यह आयोजन बाल वैज्ञानिकों की सोच को मंच उपलब्ध कराने के लिए है। इससे शोध के उत्सुक बच्चों को अपने प्रतिभा को आगे लेकर आने की प्रेरणा मिलेगी। परिषद के निदेशक ने कहा कि वैज्ञानिक क्रिया विधि को समझना और वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करना इस आयोजन का उद्देश्य है।

क्षेत्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी महादेव पांडेय ने कहा कि बाल वैज्ञानिक मन में उपजे सवाल का समाधान खोजने में सहज भाव से अनुसंधान कर बैठते हैं। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना ही केंद्र का मकसद है। नोडल अधिकारी सुरेश चंद्र शर्मा और कांग्रेस के एकेडमिक कोआर्डिनेटर दीपक शर्मा, डॉ. सुधीर कुमार सिंह, संयुक्त निदेशक डॉ. राजेश गंगवार आदि पूरे दिन को सफल बनाने में लगे रहे। दोपहर बाद प्रदेश के सभी जिलों से आए नन्हें वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान का प्रदर्शन किया।

दो बाल वैज्ञानिक राष्ट्रीय कांग्रेस में जाएंगे

बाल वैज्ञानिकों के शोध की गुणवत्ता की परख का कार्य कर वैज्ञानिक बीके त्यागी के नेतृत्व वाली 40 सदस्यीय टीम कर रही है। दोपहर बाद डीडीयू व एमएमएमयूटी के शिक्षकों की टीम नन्हें अनुसंधान कर्ताओं से मिली। पहले दिन 65 प्रोजेक्टों का प्रेजेंटेशन निर्णायक मंडल के सामने हुआ। प्रेजेंटशन का क्रम गुरुवार को भी पूरे दिन चलेगा। बुधवार को परिणाम घोषित किए जाएंगे। 42 सर्वश्रेष्ठ बाल वैज्ञानिकों को चुनकर यहां से राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में भाग लेने के लिए केरल भेजा जाएगा। इनमें सबसे अच्छे दो बाल वैज्ञानिकों का चुनाव कर उन्हें इंडियन साइंस कांग्रेस में भेजा जाएगा, जहां वह देश के ख्यातिलब्ध वैज्ञानिकों के सामने अपने अनुसंधान प्रस्तुत करेंगे। बंगलुरू में 3 जनवरी से होने वाले इंडियन साइंस कांग्रेस का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे।

ऐसे तैयार हुआ एल्गी से कागज

12वीं की छात्रा निदा ने बताया कि उसने स्कूल परिसर में बरसात के बाद कुछ जगह एल्गी (काई) देखी। लंबे समय से पानी लगने के कारण यह हुआ था। कुछ दिन बाद धूप हुई तो वहां काई की जगह हरे रंग की कागज जैसी पपड़ी बन गई थी। निदा ने शिक्षक संजना पूछा तो उन्होंने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी। यहीं से एल्गी से कागज बनाने का विचार आया। बरसात में जमी एल्गी को उबाला गया तो वह कागज की तरह फैल गया। इसे सुखा कर प्रेस किया गया तो कागज तैयार हो गया। थोड़े ऑर्गेनिक रंग आदि मिलाकर शादी के रंग बिरंगे कार्ड तैयार हो गए। ब्लीचिंग पाउडर मिलाने से इसका हरा रंग गायब हो गया। तब उससे सफेद रंग का कागज बनाया गया। अध्ययन से पता चला कि एल्गी में सैल्यूलोज की मात्रा अधिक व लिपिड्स की मात्रा कम होती है।

इस पैड पर साल में महज 1000 रुपये ही खर्च

मेरठ की 11वीं की छात्रा खुशी ने बताया कि उसने घर की दाई के बीमार होने पर जब वजह पूछी तो पता चला कि उसे इसलिए इन्फेक्शन हो गया था क्योंकि वह आर्थिक दिक्कतों के कारण सेनेटरी पैड की जगह घर में पड़े गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती थी। यहां से खुशी को ऐसा सेनेटरी पैड बनाने का आइडिया आया, जो बार-बार इस्तेमाल हो। लागत कम आए। अपने टीचर वीके गुलाटी के सहयोग से उसने काम शुरू किया और तीन महीने में सफल हो गई। खुशी ने बताया कि उसने यह बनाने के लिए रुई, कपड़े व बनाना फाइबर का इस्तेमाल किया है। तीन लेयर वाले इस पैड को धोकर साफ किया जा सकता है। डेटॉल से यह पूरी तरह साफ हो जाएगा। एक महीने का काम एक ही पैड से चल जाएगा। महज एक हजार रुपये में ही एक साल का काम चल जाएगा।

सर्वे कर समझा है दृष्टिबाधित बच्चों का दर्द

कर्वी चित्रकूट से आईं दृष्टिबाधित ज्ञानवती पटेल ने सर्वे के आधार पर अन्य दृष्टिबाधित बच्चों का दर्द समझा है। अपने स्कूल के 100 दृष्टिबाधित बच्चों में सर्वे के बाद ज्ञानवती ने पाया कि यह कर्मों का फल नहीं बल्कि बीमारी है। ऐसे में दृष्टिबाधित बच्चों का तिरस्कार गलत है। ज्ञानवती ने यह सर्वे दृष्टिबाधित बच्चों को समाज से मिल रहे तिरस्कार से उबारने के लिए किया है। वह अपनी गाइड पूजा साहनी के साथ बाल विज्ञान कांग्रेस में आई हैं। ज्ञानवती इसी सर्वे पर आधारित अपना प्रोजेक्ट प्रस्तुत करेंगी।

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