Now cultivate rice in less water like wheat - गेहूं की तरह कम पानी में उगाइये धान DA Image

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गेहूं की तरह कम पानी में उगाइये धान 

पानी के अधिक इस्तेमाल के चलते कम वर्षा और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में धान की खेती को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसका जवाब गोरखपुर से निकला है। इस सीजन दस गांवों के कुल सौ एकड़ खेत में धान की सीधी बुवाई को नाबार्ड ने मंजूरी दे दी है। यह प्रस्ताव गोरखपुर के मूल निवासी और देश-दुनिया में धान अनुसन्धान के क्षेत्र में बड़ी भूमिकाएं निभाते रहे प्रो.बैजनाथ सिंह का था। 2011 में सेंट्रल राईस रिसर्च सेंटर के निदेशक पद से सेवानिवृत होने के बाद प्रो.बैजनाथ सिंह सरदारनगर ब्लॉक के विशुनपुर गौनर गांव में 10 एकड़ के अपने फार्म हाउस में खेती की नई विधाओं को आजमा रहे हैं। 

गरीब किसानों को सूखे से बचाएगी धान उगाने की ये विधा
सीधी बुवाई से बेहद कम पानी में होगी धान की खेती 
मानसून शुरू होते ही जिले के सौ एकड़ खेत में बुवाई का होगा ट्रायल 
धान विशेषज्ञ और वैज्ञानिक प्रो.बैजनाथ सिंह के प्रस्ताव को नाबार्ड की मंजूरी 
10 गांवों में चलेगा प्रोजेक्ट, किसानों को 4 हजार रुपए प्रति एकड़ मिलेंगे

गेहूं की बुवाई के बराबर पानी के इस्तेमाल से धान की बुवाई का रास्ता खोजने के पीछे प्रो बैजनाथ जो वजह बताते हैं उसका रिश्ता उत्तर प्रदेश में धान बुवाई के क्षेत्रफल में कम वर्षा या सूखे की स्थिति के चलते आने वाली कमी से है। प्रदेश में धान बुवाई का कुल क्षेत्रफल 51 से 60 लाख हेक्टेयर के करीब रहता है। 9 लाख हेक्टेयर के इस अंतर के पीछे मुख्य वजह सूखा या कम वर्षा है। छोटे और गरीब किसानों के लिए सिंचाई के खर्चीले साधनों का इस्तेमाल नामुमकिन होता है। मजबूरी में वे कम वर्षा वाले साल धान की रोपाई नहीं कर पाते। 

प्रो.बैजनाथ बताते हैं,'पानी की समस्या के चलते ही झारखंड में 2008 के 16 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 2009 में 9 लाख हेक्टेयर और 2010 में 7 लाख हेक्टेयर ही धान क्षेत्रफल रह गया था। तब वह झारखंड के बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में निदेशक पद पर थे। तभी से धान की सीधी बुवाई की ब्राजीली तकनीक पर प्रयोग शुरू किए। 2011 के बाद इसे गोरखपुर में अपने फार्म हाउस पर आजमाया। इसमें खेत का लेवा, बेहन डालने और रोपाई की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पानी का खर्च करीब 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है।’

प्रो.बैजनाथ सिंह के शब्दों में, ‘इसे एरोबिक विधि कहते हैं क्योंकि जुते हुए खेत में हवा नीचे तक जाती है। जरा भी बारिश हो जाए तो पानी नीचे तक जाता है और खेत नम हो जाता है। इस साल 25 मई से 10 जून तक रोहिन नक्षत्र में वर्षा नहीं हुई। 10 जून से 20 जून तक मृगटाह नक्षत्र में वर्षा होने की उम्मीद है। जब भी अच्छी बारिश हुई तब कल्टीवेटर, हैरो या प्लाऊ से खेत की जुताई कर छोड़ देंगे। खेत नम होने के बाद सीड ड्रिल से सीधी बुवाई करेंगे। सीधी बुवाई में पौधा नीचे जड़ से ऊपर आने के चलते मजबूत होता है। जबकि रोपाई वाले धान में पौधे की जड़ें सतह पर फैलती हैं।’

आधा रह जाता है पानी का इस्तेमाल 
एरोबिक राईस कंसेप्ट से बुवाई में पानी का इस्तेमाल आधा रह जाता है। यह लगभग गेहूं की बुवाई के बराबर होता है। प्रो.सिंह बताते हैं कि गेहूं की बुवाई के समय मौसम ठंडा होता है इसलिए छह घंटे की सिंचाई से एक एकड़ खेत बुवाई के लिए तैयार हो जाता है जबकि धान की बुवाई में गर्म मौसम की वजह से शुरू में इसमें 12 घंटे लगते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी किराए पर 120 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से सिंचाई होती है। सो कृत्रिम साधनों से खेत तैयार कर रोपाई पद्धति के जरिए बुवाई करना काफी खर्चीला और मुश्किलतलब होता है। 

इन प्रजातियों के धान की होगी बुवाई
इस विधि में प्रजातियों का चुनाव सूखा बर्दाश्त करने की क्षमता के आधार पर होता है। सरयू-52, डीआरटी (ड्राउट टॉलरेंस) जीन वाला सांभा मसूरी, डीआरटी-42,डीआरटी-44, डीआरटी-50 सहित कई प्रजातियों के धान इस विधि से बोए जाएंगे। 

प्रति एकड़ 25 कुंतल की उपज 
प्रो.बैजनाथ सिंह के मुताबिक सीधी बुवाई से प्रति एकड़ 25 कुंतल तक की उपज मिल सकती है। ब्राजील जैसे देश में धान की बौनी प्रजाति से 30 कुंतल प्रति एकड़ तक की उपज मिलती है। 

इन गांवों में किया जाएगा प्रयोग 
चरगांवा ब्लाक के रामपुर गोपलापुर, माल्हनपार-गोला रोड स्थित सपहा, बरियार, गोपलापुर, मंझरिया, डांड़ी, हाटा सहित कुल दस गांवों में प्रयोग किया जाएगा। 

किसान को प्रति एकड़ चार हजार की मदद 
प्रयोग के दौरान किसान को प्रति एकड़ चार हजार रुपए की दवा और बीज मुहैया कराए जाएंगे। 

44 वर्षों से धान पर कर रहे शोध
प्रो.बैजनाथ सिंह पिछले 44 वर्षों से धान पर शोध कर रहे हैं। वह पंतनगर कृषि विवि, राजेन्द्र कृषि विवि पूसा बिहार, अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलिपीन्स, वेस्ट अफ्रीका राईस डेवलपमेंट एसोसिएशन (वारडा) नाइजेरिया, चावल अनुसंधान केंद्र कटक उड़ीसा, बिरसा कृषि विवि रांची जैसे संस्थानों में उच्च पदों पर कार्यरत रहे हैं।

 
 

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