DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जब फिराक की गाड़ी छुड़वाने मंच से नीचे उतर आए नेहरू

गोरखपुर के राजनीतिक इतिहास में उर्दू के मशहूर शायर रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी’ का भी नाम आता है। नेहरू व इंदिरा गांधी से उन्हें अत्यधिक स्नेह मिलता था। एक बार लोकसभा चुनाव में गोरखपुर के टाउनहाल पर नेहरू की सभा चल रही थी। उसमें फिराक को भी शामिल होना था। फिराक बस से टाउनहाल आ रहे थे लेकिन कचहरी से कुछ पहले ही पुलिस वालों ने उनकी बस रोक दी। नेहरू को जब पता चला तो वे मंच से उतरकर फिराक के पास आए और उनकी बस छुड़ाकर ले गए। 

दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान फिराक गोरखपुरी को सम्मानित करतीं इंदिरा गांधी।
डिप्टी कलेक्टरी की नौकरी छोड़ राजनीति में कूदे थे फिराक 
ताउम्र कांग्रेस के लिए ही काम किया था फिराक साहब ने

फिराक गोरखपुर स्वभाव से फक्कड़ी थे। एक बार जो ठान लिया फिर पीछे नहीं हटते थे। उनके करीबी भी इससे बखूबी वाकिफ थे। एक जिद के चलते वे 1951 में गोरखपुर डिस्ट्रिक्ट साउथ से जेबी कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी से लोकसभा का चुनाव भी लड़े। जनता ने जो प्यार उन्हें उनकी शायरी के लिए दिया, उसका रत्ती भर भी वोट की शक्ल में नहीं बदला और उनकी जमानत जब्त हो गई। इस हार से फिराक बुरी तरह आहत हुए और उन्होंने इसका जिम्मेदार अपने रिश्तेदार प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना को ठहराया। इसके बाद से उन्होंने चुनाव लड़ने से तौबा कर लिया। उन्हें हमेशा इस बात का मलाल रहा कि प्रो. सिब्बनलाल ने नेहरू की पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़वा दिया।

बस ही था फिराक का चलता-फिरता दफ्तर
चुनाव प्रचार के दिनों में उरुवा के मैना खां की बस ही फिराक साहब का प्रचार वाहन और चलता-फिरता दफ्तर भी था। वे इसमें खाने-पीने के अलावा फावड़ा, बेलचा, खांची आदि भी रखे रहते थे। प्रचार के दिनों में सड़क पर जहां कहीं भी गड्ढे दिखते, फिराक बस रुकवाकर उसे भर देते थे।   

ठुकरा दी थी राज्यसभा सदस्य की पेशकश
फिराक को करीब से जानने वाले व वरिष्ठ साहित्यकार रविन्द्र श्रीवास्तव ‘जुगानी भाई’ का कहना है कि फिराक आजीवन कांग्रेसी रहे और उसी के लिए काम किया। उनकी राजनीति में गहरी रुचि थी लेकिन वे स्वार्थी बिल्कुल भी न थे। एक बार जब इंदिरा गांधी ने जवाहर लाल नेहरू की सिफारिश पर उन्हें राज्यसभा में भेजने की बात की तो फिराक ने बड़ी विनम्रतापूर्वक उनके पेशकश को ठुकरा दिया। बोले- आप ने इस ओहदे के लिए मुझे लायक समझा यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।

पिता की वजह से हुई थी नेहरू से दोस्ती
फिराक गोरखपुरी सेवा संस्थान के संस्थापक डॉ. छोटेलाल ‘प्रचंड’ का कहना है कि 28 अगस्त 1896 को गोरखपुर के दक्षिणांचल में स्थित गोला में जन्मे फिराक गोरखपुरी के पिता का नाम गोरख प्रसाद इबरत पेशे से इलाहाबाद में अधिवक्ता थे। वे पंडित मोतीलाल नेहरू के खास दोस्तों में एक थे। इसके चलते फिराक का भी आनंद भवन आना-जाना शुरू हो गया। इस दौरान वे जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आए और बेहद घनिष्ठ बन गए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Nehru climb down to release Firaq Vehicle in Gorakhpur