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1 अप्रैल, 2020|8:15|IST

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लॉकडाउन से झुग्गी वालों की गृहस्थी के पहिए भी ‘लॉक

लॉकडाउन से झुग्गी वालों की गृहस्थी के पहिए भी ‘लॉक

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जारी लॉकडाउन से डोमिनगढ़ में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले दर्जनों परिवारों की गृहस्थी के पहिए ‘लाक हो गए हैं। इन परिवारों के पुरुष सदस्य दिहाड़ी मजदूर हैं और महिलाएं लोगों के घरों में चौका-बर्तन करती हैं। लॉकडाउन में पुरुषों को काम नहीं मिल रहा है और महिलाओं से लोगों ने चौका-बर्तन कराने से तौबा कर ली है। इन परिवारों में बड़ी मुश्किल से एक वक्त चूल्हा जल पा रहा है।

डोमिनगढ़ चौराहे के समीप खाली जमीन पर कुछ परिवार झुग्गी-झोपड़ियां डालकर रहते हैं। कुछ रोज पहले तक महिलाएं तड़के जागकर रूखी-सूखी रोटियां पका देती थीं और पुरुष सदस्य कुछ रोटियां खाते थे और कुछ लेकर काम की तलाश में तिवारीपुर मजदूर मंडी पहुंच जाते थे। यहां से शहर के लोग दिहाड़ी मजदूरी तय कर इन्हें ले जाते थे। उधर परिवार की महिलाएं इन्हें काम पर भेजने के बाद खुद आसपास के मोहल्लों और कालोनियों में जाकर चौका-बर्तन करती थीं। महीने में उन्हें औसतन 2 हजार रुपये मिल जाते थे और इनकी गृहस्थी चलती रहती थी।

इन झुग्गियों में रहने वाली शांति देवी ने गुरुवार को ‘हिन्दुस्तान से कहा कि, ‘बाबू कोरोना क डर त अइसन बा की कहिं काम नाहिं मिलत बा। जहां काम रहल वहां लोग अब बोलवते नाहीं बा। सुधा ने कहा, ‘तीन दिन हो गइल, न हमहन के कहिं काम पर गइलीं न मालिक के ही कहीं मजूरी मिलल। कइसे खाना बनी ई सोचि के मन घबरात बा। जानकी ने झोपड़ी की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘हम गरीबन के केहू पूछे वाला नाई बा। कोरोना से खतरा त बा लेकिन लगत बा जान भूखन भी चलि जाई।

हे देई माई जल्दी ई कोरोना खतम हो जात

दो वक्त की रोटी के लिए परेशान महिलाओं की बस एक ही इच्छा है कि जल्द कोरोना का खतरा खत्म हो जाए। वह चाहती हैं कि कोरोना के कारण लगी रोक जल्द खत्म हो जाए। उनके घर वाले काम पर जाएं और मेहनत-मजदूरी कर कुछ रुपये ले आएं ताकि दो वक्त की रोटी मिल सके। बातचीत के दौरान एक महिला ने कहा... ‘हे देई माई जल्दी ई कोरोना खतम हो जात। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि ‘खतम हो जाई बहिनी। संकट ढेर दिन थोड़े रहला।

बेपरवाह बच्चे खेलने में मगन

झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन काट रहे इन परिवारों के महिला और पुरुष सदस्य गुरुवार को कोरोना के संक्रमण के डर और दो वक्त की रोटी की चिंता में डूबे थे। वहीं इनके बच्चे बेपरवाह खेलने-कूदने में मगन थे। परिवार की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं से अनजान लोगों को बातें करते देख वे नजदीक आए लेकिन कुछ पल ठिठकने के बाद खेलने में मस्त हो गए।

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  • Web Title:Locked wheels of slum households also 39 locked 39