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गोरखपुर के इसी ईदगाह पर लिखी प्रेमचंद ने कालजयी कहानी ईदगाह,जानें उनके बारे में सब- वीडियो देखें

तिलस्मी एवं रहस्यमय मनोरंजन कहानियों के दौर से निकाल कर आज जनजीवन के यथार्थ की ओर ध्यान खींचने वाले कथाकार प्रेमचंद अपने समय की वर्जनाओं को तोड़ते हुए दे और दुनिया में ख्यात हुए। गोरखपुर से उनकी रचनाधर्मिता का बड़ा अध्याय जुड़ा हुआ है। उन्होंने न केवल यहां अपना बचपन गुजारा बल्कि जिस स्कूल में शिक्षा ग्रहण की, शिक्षक रहते हुए रचानाकार प्रेमचंद का व्यक्तित्व एवं सृजन भी उभारा। कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती सोमवार 31 जुलाई को मनाई जाएगी।

गोरखपुर के प्रेमचंद्र पार्क स्थित उनकी कुटिया और परिसर में स्थापित उनकी आदम कद प्रतिमा पर रविवार से माल्यार्पण का दौर शुरू हो गया। प्रेमचंद ने जन सामान्य की पीड़ा को महसूस किया और अपनी रचनाओं में उन्हें पुरजोर स्थापित किया।

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ईद-ईदगाह और कथा सम्राट महान प्रेमचंद



कौन थे प्रेमचंद

प्रेमचंद का नाम असली नाम धनपत राय था। उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस शहर से 4 मील दूर लमही गांव में हुआ। प्रेमचंद के पिता मुंशी अजायब लाल थे जो डाकघर में मुंशी का पद संभालते थे। प्रेमचंद जब 6 वर्ष के थे। तभी उन्होंने लालगंज गांव में रहने वाले मौलवी से फारसी और उर्दू की शिक्षा ली। बचपन में ही बीमारी के कारण मां को खोद दिए। बड़ी बहन से प्यार मिला लेकिन उसके विवाह के बाद अकेले हो गए। स्वयं को कहानियां पढ़ने में व्यस्त कर लिया। यही से कहानियां लिखने की प्रेरणा मिली। 

15-16 वर्ष की उम्र में ही हो गया था विवाह

सिर्फ 15-16 बरस की उम्र में ही विवाह हो गया। कुछ समय बाद ही पत्नी का देहांत हो गया। उन्होंने बाद में एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिन्होंने उनकी जीवनी लिखी थी। प्रेमचंद्र ने लगभग 300 कहानियां एवं चौदह बड़े उपन्यास लिखे। सन् 1935 में मुंशी जी बहुत बीमार पड़ गए और 8 अक्तूबर 1936 को 56 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।उनके रचे साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओं समेत विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। 

प्रेमचंद की चर्चित कहानियां हैं

मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, आत्माराम, बूढ़ी काकी, बड़े भाईसाहब, बड़े घर की बेटी, कफन, उधार की घड़ी, नमक का दरोगा, पंच फूल, प्रेम पूर्णिमा, जुर्माना एवं अन्य।


पढिएं प्रेमचंद की कहानी

कहानी: बाबाजी का भोग

प्रेमचन्‍द के उपन्‍यास
गबन, बाजार-ए-हुस्न (उर्दू में), सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा और मंगल-सूत्र (अपूर्ण) आदि।

फिल्में भी बनी

प्रेमचंद की कहानियों पर सत्यजीत राय ने यादगार फिल्में बनाईं। 1977 में 'शतरंज के खिलाड़ी' और 1981 में 'सद्गति' ने लोकप्रियता हासिल की। इसी तरह के सुब्रमण्यम ने 1938 में 'सेवासदन' उपन्यास पर फिल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य किरदार में थी। 1963 में 'गोदान' और 1966 में 'गबन' उपन्यास पर लोकप्रिय फिल्में बनीं। 1980 में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक 'निर्मला' भी खासा लोकप्रिय हुआ। 1977 में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी 'कफन' पर आधारित 'ओका ऊरी कथा' नाम से एक तेलुगू फिल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

पढ़िए 

प्रेमचंद का यह आलेख जिसे उन्होंने ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ शीर्षक से यह जनवरी 1934 में लिखा था

टिप्पणी: संस्कृति की दुहाइयों का दौर

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  • Web Title:Katha Samrat Premchand Ki Jayati started on Monday, the time to remember them