कूल्हा प्रत्यारोपण से पैर नहीं होगा छोटा या बड़ा
Gorakhpur News - ऑर्थो एज का हुआ समापन कूल्हा प्रत्यारोपण के बाद अक्सर ज्यादातर मरीजों के पैर छोटे या बड़े हो जाते हैं। दोनों पैर के बीच में पांच लेकर 15 मिलीमीटर(मि

गोरखपुर वरिष्ठ संवाददाता। कूल्हा प्रत्यारोपण के बाद अक्सर कई मरीजों के पैर छोटे या बड़े हो जाते हैं। दोनों पैर के बीच में पांच से 15 मिलीमीटर (मिमी) तक का अंतर हो जाता है। इसे दूर करने के लिए प्रत्यारोपण की नई तकनीक विकसित की गई है, इसे डायरेक्ट एटीरियर एप्रोच टू टोटल हिप रिप्लेसमेंट कहते हैं। पीजीआई लखनऊ के डॉ. कुमार केशव ने रविवार को कहा कि अब कूल्हा प्रत्यारोपण के लिए चिकित्सक पीठ के बजाय पेट की तरफ से सर्जरी करेंगे। अमेरिका में अब 50 फीसदी कूल्हा प्रत्यारोपण इसी तकनीक से हो रहा है। इसके लिए विशेष प्रकार के ओटी टेबल की जरूरत होती है।
हालांकि पीजीआई लखनऊ में नॉर्मल ओटी टेबल पर ही इस सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। पेट की तरफ से सर्जरी करने पर पैर के छोटा या बड़ा होने का रिस्क बेहद कम होता है। दोनों पैरों के बीच दो मिलीमीटर से भी कम का अंतर रहता है। 12 प्रांतों के 450 चिकित्सक हुए शामिल पूर्वी यूपी में पहली बार दो दिवसीय आर्थो एज 2025 का आयोजन हुआ। यह आयोजन यूपी आर्थोपेडिक एसोसिएशन ने किया। आयोजन सचिव डॉक्टर अमित मिश्रा ने बताया कि यह अपनी तरह का पहला आयोजन है। इस आयोजन में गोरखपुर और बनारस के चिकित्सकों ने कोऑर्डिनेशन किया। इसमें 12 राज्यों के 450 चिकित्सकों ने अपने व्याख्यान दिए। पीजी छात्रों ने रिसर्च पेपर पढ़ा। लाइव सर्जरी करके दिखाया गया। जन्म से बच्चों में कूल्हा हो सकता है खराब केजीएमयू के डॉ संजीव कुमार और डॉ. बीबी त्रिपाठी ने बताया कि जन्म से बच्चों का कूल्हा खराब हो सकता है। इसे हिप डिस्प्लेजिया कहते हैं। यह जन्मजात विकृति है। कुछ बच्चों में यह जन्म के दो से तीन साल बाद सामने आती है। इसमें कूल्हे की हड्डियां पतली हो जाती हैं। जोड़ आपस में चिपक जाते हैं। पैर छोटा हो जाता है। दांतों में संक्रमण खराब कर सकता है कूल्हा प्रत्यारोपण सैफेई के डॉ. अजय राजपूत व डॉ. अमित सिंह श्रीनेत ने कूल्हा प्रत्यारोपण के एक महीने के अंदर इंफेक्शन होने पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि दांतों का संक्रमण भी कूल्हे के प्रत्यारोपण को खराब कर सकता है। इससे प्रत्यारोपण के बाद इंफेक्शन हो जाता है। खून में छिपा संक्रमण कूल्हे की सर्जरी को फेल कर सकता है। इसका इलाज हो सकता है, इसे पल्स लिवाज कहते हैं। इसमें मरीज को ऑपरेशन थिएटर में बुलाकर उसके मवाद को साफ कर दवा लगाया जाता है। बुजुर्गों में होने वाले एसिटेबुलम फ्रैक्चर पर डॉ रितेश कुमार, डॉ. आलोक सिंह, डॉ. संजीव सिंह, डॉ. अनुपम श्रीवास्तव ने व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि कूल्हे की जोड़ की हड्डी टूटने पर फ्रैक्चर हो जाता है। आमतौर पर यह फ्रैक्चर कूल्हे की कटोरी में होता है। डॉ. हरपाल सिंह शेट्टी, डॉ. एसके त्रिपाठी ने कूल्हा प्रत्यारोपण के बाद हड्डी में फ्रैक्चर पर व्याख्यान दिया। इस दौरान डॉ. अशोक यादव, डॉ. सुधीर श्याम कुशवाहा ने भी व्याख्यान दिया।
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