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उपेक्षा: पार्सल को ‘भारत-भ्रमण’ पर भेज देता है रेलवे!

indian rail

बाइक, अलमारी जैसे सामान पूरे देश में घूमने के बाद भी सही स्टेशन पर नहीं उतरते। हफ्तों चक्कर लगाते रहते हैं सामान बुक कराने वाले, रेलवे में रोज आ रहीं 10-12 शिकायतें। दिल्ली से गोरखपुर आने वाला पार्सल पहुंच जाता है बरौनी, कटिहार या फिर दरभंगा।


केस-1: चेन्नई टू गोरखपुर
एक साल पहले चेन्नई से गोरखपुर स्थानांतरित होकर आए स्टेशन मास्टर दिवेश तिवारी ने चेन्नई में अपनी बाइक गोरखपुर के लिए बुक कराई। वह खुद तो सपरिवार गोरखपुर आ गए लेकिन उनकी बाइक नहीं आई। पड़ताल शुरू कराई तो पता चला कि गोरखपुर की बजाए उनकी बाइक दिल्ली चली गई। जब वहां से पूछताछ हुई तो सामने आया कि अभी उनकी बाइक मुम्बई में है। कुछ कार्रवाई करते तब तक उनकी बाइक नागपुर पहुंच चुकी थी। दो महीने बीत गए। आखिरकार वह खुद चेन्नई गए और लम्बी पड़ताल के बाद चला कि बाइक वापस चेन्नई पहुंच चुकी है। 

‘‘सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता। कभी कुछ तकनीकी कारणों से पार्सल दूसरे स्टेशनों पर चला जाता है। ऐसा होने पर जल्द से जल्द उसे निर्धिारित स्टेशन पर पहुंचा दिया जाता है।’’
संजय यादव, सीपीआरओ, एनईआर

केस-2: अम्बाला टू गोरखपुर
गोरखपुर में बतौर स्क्वाड्रन लीडर पोस्टिंग के बाद दीपक यादव ने अपनी बाइक अम्बाला से बुक करवाई और अपने सामने ही आम्रपाली एक्सप्रेस में लोड करवा दी। ट्रेन के साथ ही वह गोरखपुर आ गए और जब तक उतरकर वह लगेज कोच के पास जाते, ट्रेन चल चुकी थी। उन्होंने पार्सल आफिस में संपर्क किया। पता चला कि बाइक गोरखपुर नहीं उतर सकी और कटिहार चली गई। अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि दो दिन बाद जब वही ट्रेन गोरखपुर आएगी तो उससे उनकी बाइक आ जाएगी। 

यह दोनों मामले ताजे हैं। पूर्वोत्तर रेलवे में रोज ऐसी 10-12 शिकायतें आती हैं। लोग अब कहने लगे हैं कि बुक कराया गया पार्सल बिना भारत भ्रमण किए नहीं मिलने वाला। देश के तमाम स्टेशनों में घूमने के बाद ही हफ्तों और कभी-कभी तो महीनों बाद सामान हाथ में आ पाएगा। पड़ताल में पता चलता है कि दिल्ली से गोरखपुर आने वाला पार्सल बरौनी, कटिहार या फिर दरभंगा पहुंच गया। 

पार्सल कर्मियों के सामने सिस्टम को रोड़ा
दरअसल पार्सल कर्मियों के सामने दिक्कत भी कम नहीं। बाहर से आने वाली ट्रेनों में कई स्टेशनों के लगेज होते हैं। जिसमें अक्सर बीच के स्टेशनों पर उतरने वाले सामान एकदम पीछे दब जाते हैं। ऐसे में पार्सल कर्मियों को महज से 10 से 15 मिनट में सामान उतारने में काफी असुविधा होती है। ट्रेन चल देती है। सामान उतारने के लिए ट्रेन निश्चित स्टापेज से महज 5 मिनट अधिक ही रोकी जा सकती है।

 

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