HIV composition in Asia is different from Western countries - पश्चिमी देशों से अलग है एशिया में एचआईवी की संरचना DA Image
19 फरवरी, 2020|11:54|IST

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पश्चिमी देशों से अलग है एशिया में एचआईवी की संरचना

पश्चिमी देशों से अलग है एशिया में एचआईवी की संरचना

मौत की बीमारी माने जाने वाले एचआईवी के इलाज की तलाश में जुटे विशेषज्ञों को अहम सफलता मिली है। एशिया में जानलेवा बीमारी फैलाने वाले वायरस की पहचान एचआईवी वन-सी के रूप में हुई है। इस वायरस को निष्क्रिय करने के लिए नैनो-मॉलीक्यूल्स को तलाशा जा रहा हैं।

यह जानकारी लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के सेल कल्चर यूनिट के प्रो. शैलेंद्र कुमार सक्सेना ने दी। वह दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में बतौर वक्ता मौजूद रहे। कार्यशाला का विषय है भोजन, स्वास्थ्य और पर्यावरण में परिवर्तन। कार्यशाला में 16 विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं।

प्रो. सक्सेना ने बताया कि एचआईवी पीड़ित के इलाज के लिए अब तक पश्चिमी देशों से ही दवाएं आयात की जाती हैं। यह दवाएं यहां के मरीजों पर बेहद कारगर नहीं थी। इसकी पड़ताल में पता चला कि पश्चिमी देशों में प्रभावी एचआईवी और एशिया प्रभावी एचआईवी की संरचना में अंतर है। पश्चिमी देशों में प्रभावी वायरस को एचआईवी वन-बी और एशिया में संक्रमण फैलाने वाले को एचआईवी वन-सी नाम दिया गया है। रिसर्च में यह भी सामने आया है कि वन-सी खून के जरिये दिमाग में जाकर व्यक्ति को खुशमिजाज रखने वाले हार्मोन सेरोटोनिन का स्तर कम करता है।

बाढ़ हो या सूखा, लहलहाएगी धान की फसल

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट बायोटेक्नोलॉजी के निदेशक प्रो. एनके सिंह ने बताया कि किसानों के लिए राहत की खबर है। बाढ़ और सूखे के प्रकोप से धान की फसल खराब नहीं होगी। इसके लिए संस्थान में सांभा-मंसूरी धान की नई प्रजाति ‘डीआरआर 50 विकसित की है। इसमें बाढ़ या सूखा की परिस्थिति से निपटने में सक्षम जीन को क्रॉस के जरिये विकसित किया गया। देश के कुछ क्षेत्रों में इसकी बुवाई की जा रही है। जंगली धान (तिन्ना-चावल) में भी मानसून से लड़ने की क्षमता होती है। उसके जीन को भी सामान्य धान के जीन से क्रॉस कराकर नई प्रजाति तैयार की जा रही है। सबसे बड़ी खासियत यह है कि नई प्रजाति के धान में मौसम के बदलाव के बावजूद उत्पादकता कम नहीं होगी।

डायबिटीज और कैंसर में कारगर सोयाबीन

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग भोपाल के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी ने बताया कि सोयाबीन में कई प्रकार के सोयाप्रोटीन पाए जाते हैं। यह कैंसर और डायबिटीज के इलाज में कारगर है। इतना ही नहीं सोयाबीन में एस्ट्रोजेन मिलता है। यह महिलाओं के मेनोपॉज से होने वाली बीमारियों से बचाता है। सोयाबीन से अब पनीर की तरह ही टोफो का निर्माण हो रहा है। उन्होंने बताया कि फल और सब्जियों के छिलकों में भी पौष्टिक पदार्थ पाया जाता है। इसके जरिए फूड सप्लीमेंट बनाया जा रहा है। इसमें केले का छिलका, बंद गोभी की डंठल और मटर का छिलका शामिल है।

पानी से आर्सेनिक खत्म करेगी जंगली पौधे की जड़

नेशनल एन्वायरमेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर के डॉ. बीके सारंगी ने बताया कि पानी में घुलित आर्सेनिक अब बड़ी समस्या बन गया है। देश में कैंसर के मरीजों की बढ़ती संख्या की एक वजह आर्सेनिक भी है। इसके कारण दांत पीले हो जाते हैं। हाथों में सूजन हो जाता है। पानी में आर्सेनिक अधिक होने से खाद्यान्न का उत्पादन प्रभावित होता है। पानी में आर्सेनिक खत्म करने के लिए रसायनों का प्रयोग किया जाता है। इन रसायनों के दुष्प्रभाव होते हैं। इस खतरे को कम करेगा जंगली पौधा टेरिस-बटाटा। यह पौधा केरल से लेकर असम तक के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। इस पौधे में आर्सेनिक को अवशोषित करने के गुण होते हैं। पौधे की इसी खासियत को पानी में से आर्सेनिक को खत्म करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसे रूट जोन ट्रीटमेंट सिस्टम कहते हैं। पानी को इस पौधे की जड़ के जरिये प्रवाहित किया जाता है। इससे पानी में आर्सेनिक की मात्रा नगण्य रह जाती है।

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