एक सिलेंडर का भी खर्च नहीं, पकता है 20 हजार लोगों का खाना
Gorakhpur News - चौरीचौरा के तरकुलहा मंदिर परिसर में लकड़ी और उपले पर पकता है खाना लिट्टी और

अजय श्रीवास्तव गोरखपुर। रसोई गैस सिलेंडर की किल्लत के बीच महानगरों से प्रवासी मजदूरों का पलायन हो रहा है तो गैस एजेंसियों के बाहर सिलेंडर की उम्मीद में भोर तीन बजे से ही कतारें लग रही हैं। वहीं, गोरखपुर में एक स्थान ऐसा है, जहां रोज बिना एक सिलेंडर खर्च हुए 15 से 20 हजार लोगों का खाना पकता है। यह स्थान है ऐतिहासिक चौरीचौरा क्षेत्र का तरकुलहा देवी मंदिर। जहां बकरे की बलि देने के बाद प्रसाद के रूप में लोग मटन और लिट्टी ग्रहण करते हैं। यह उपला और लकड़ी पर बनता है। यहां नेपाल, बिहार के साथ ही पूर्वांचल से आने वाले लोग आस्था और पिकनिक के मिश्रण का आनंद लेते दिख जाते हैं।गोरखपुर
से देवरिया रोड पर करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह प्रसिद्ध सिद्धपीठ 1857 के क्रांतिकारी बाबू बंधु सिंह से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां बंधु सिंह अंग्रेजों के सिर काटकर माता को चढ़ाते थे। वैसे तो यहां चैत्र नवरात्रि में एक महीने तक मेला लगता है, जहां श्रद्धालु मन्नत मांगने दूर-दूर से आते हैं। लेकिन अब साल के 365 दिन यहां मेले जैसा नजारा होता है। इसे सिलेंडर की किल्लत कहें या फिर चैत्र नवरात्रि के बाद मेले का उत्साह, वर्तमान में यहां प्रतिदिन 15 से 20 हजार श्रद्धालु देवी दर्शन के बाद खाना पका कर खा रहे हैं। तरकुलहा देवी मंदिर में हांडी मटन बनाने के विशेषज्ञ विकास बताते हैं कि यहां टैक्टर, मैजिक के साथ ही डिफेंडर जैसी लग्जरी गाड़ी से भी लोग पहुंचते हैं। मेले का दृश्य यहां हर वक्त दिखता है।उपला ने हजारों को दे दिया रोजगारतरकुलहा मेला परिसर में प्रतिदिन 20 हजार से अधिक उपला बिकता है। साइज के हिसाब से एक उपला 25 से 30 रुपये तक बिकता है। उपले की मांग ने चौरीचौरा, सरदारनगर के साथ ही देवरिया और कुशीनगर के जिले के गौ-पालकों को रोजगार दे दिया है। चौराचौरा क्षेत्र के शत्रुधनपुर, देवीपुर, करमहा, देवकहिया, अवधपुर, सरैया, बिलारी, भरतपुर, लक्ष्मणपुर, रामपुर रकबा समेत दो दर्जन गांवों में उपला कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। सरैया निवासी संजय पासवान का कहना है कि गांव में गो-पालकों से पहले ही संपर्क कर उपले का ऑर्डर दे देते हैं। शत्रुधनपुर की मालती और देवीपुर की मंजू कुशवाहा का कहना है कि ऑर्डर पहले से मिल जाता है। तय समय में ऑर्डर पूरा करना होता है। अलग-बगल के गांव से भी गोबर का इंतजाम करते हैं।600 रुपये दीजिए, हांडी मटन तैयार मिलेगादूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सहूलियत को देखते हुए यहां के ढाबा मालिक 600 रुपये में लकड़ी और उपले पर हांडी मटन और लिट्टी बनाकर देते हैं। दुकानदार राजेश जायसवाल का कहना है कि श्रद्धालु खुद एक किलो मटन खरीद कर लाते हैं। 600 रुपये में 4 से 5 सदस्यों वाले परिवार के लिए मटन और लिट्टी पका कर देते हैं। चाय, पकौड़ी या नाश्ते वाले आइटम को छोड़ दें तो मटन, चावल और लिट्टी को पकाने के लिए पूरे मेला परिसर में एक भी सिलेंडर का खर्च नहीं है।
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