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पानी से नहीं लापवाही में डूबे बाढ़ शरणालय

पानी से नहीं लापवाही में डूबे बाढ़ शरणालय

बाढ़ आती और जमकर तबाही मचाती। लोगों के घर-बार डूब जाते। खाने-पीने के लाले भी पड़ जाते। शासन-प्रशासन डूबे गांवों के लोगों के लिए स्कूल-कालेजों में बाढ़ शरणालय बनवाता है। लाखों रुपये पानी के तहत बहाता। 60 के दशक में बने बाढ़ शरणालयों पर नजर भी नहीं दौड़ाता। आजादी के बाद से अब तक भीषण से भीषण बाढ़ आई लेकन इन शरणालयों तक पानी नहीं पहुंचा।

बाढ़-सूखा और दहारी। इन दैवीय आपदाओं से सदियों से गांव-गिरांव प्रभावित होते रहे हैं। इनसे राहत के तरीके भी ढूंढे जाते रहे हैं। 60 और 70 के दशक में प्रशासन ने तहसीलों में सबसे उंचाई वाले स्थानों को चिह्नित कराया और उन पर बाढ़ शरणालय बनवाए। खजनी तहसील क्षेत्र के बेलघाट, सहजनवां के मोइद्दीनपुर और चौरीचौरा के डुमरैला गांव समेत कई अन्य स्थानों पर बाढ़ शरणालय बनाए गए हैँ। डुमरैला गांव निवासी विनोद ने बताया कि उन्होंने जबसे होश संभाला है, बाढ़ शरणालय पर कभी नदी का पानी चढ़ते नहीं देखा।

मोद्दीनपुर निवासी सुरेश ने बताया कि बाढ़ शरणालय इतने उंचाई पर बना है कि वर्ष 1998 और 2017 में भी इस पर पानी नहीं पहुंचा। 70 की उम्र पार कर चुके दुखी ने बताया कि पहले जब बाढ़ आती थी तो हमारे तथा आस-पास के गांवों के लोग अपने खाने-पीने का सामान लेकर यहीं आ जाते थे। प्रशासन भी यहीं से गांवों में राशन और राहत सामाग्री बंटवाता था।

इन बाढ़ शरणालयों पर बनाए गए थे टिनशेड व पक्के आवास

प्रशासन ने पहले से ऊंचे स्थानों को बाढ़ शरणालयों के लिए चुना। वहां कुछ मिट्टी पटवाकर और ऊंचा कराया। ऊंचाई वाले इस स्थान पर टिनशेड या पक्का मकान भी बनवाया। इसी मकान में राहत सामाग्री रखी जाती थी।

देखरेख के अभाव में ढह रहे हैं आवास, फैला है झाड़-झंखाड़

ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ और बंधे के नाम पर लाखों रुपये हर साल सरकार खर्च कर रही है। शासन प्रशासन के लोग आखिर दशकों पहले बने बाढ़ शरणालयों के बारे में क्यों नहीं सोचते। वहां झाड़-झंखाड़ फैला हुआ है। अगर वहां साफ-सफाई करा दी जाए। कुछ बेहतर सुविधाएं दे दी जाए तो आज भी बाढ़ के समय में गांवों को राहत पहुंचाने के लिए उससे अच्छा स्थान कोई नहीं होगा।

आज हम बांध बनाते हैं। भवन बनाते हैं लेकिन इस बात का खयाल भी नहीं रखते हैं कि बाढ़ का पानी कितनी उंचाई तक आएगा। काश! शासन प्रशासन के लोग दशकों पहले बने बाढ़ शरणालयों से सीख लेते।

राममिलन

मोइद्दीनपुर, सहजनवां

वर्षों पहले की बात है। जब हम लोग बच्चे थे। गांव के बाहर बाढ़ शरणालय बना। हम आज देखते हैं तो सोचते हैं कि तब के लोग किसी भी निर्माण को लेकर कितना सोचते थे। आज तक बाढ़ शरणालय पर पानी नहीं चढ़ सका।

इंद्रदेव

तख्ता, सहजनवां

बाढ़ शरणालय तब बहुत राहत देने वाला था। बाढ़ आने पर आस-पास के 10-20 गांवों के लोगों के लिए राशन वहीं रखा जाता था। प्रशासन भी वहीं से वितरित कराता था। अब तक मैने उस पर बाढ़ का पानी पहुंचते नहीं देखा।

विश्वनाथ

मोइद्दीनपुर, सहजनवां

प्रशासन के लोग देखते भी नहीं हैं और न ही सोचते समझते हैं। हर साल बाढ़ शरणालय के नाम पर लाखों रुपये का बंदरबांट हो जाता है।मोइद्दीनपुर के बाढ़ शरणालया को क्यों नहीं ठीक कराते हैं।

राजेंद्र

मोइद्दीनपुर, सहजनवां

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  • Web Title:Flood shelters are distroyed because of care lessness in Gorakhpur