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17 फरवरी, 2020|7:35|IST

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शोध में नैतिकता और अकादमिक सत्यनिष्ठा सबसे जरूरी

शोध में नैतिकता और अकादमिक सत्यनिष्ठा सबसे जरूरी

शोध की मौलिकता सदैव ही संदेह से परे होनी चाहिए। शोधार्थी के लिए शोध में नैतिकता और सत्य के प्रति निष्ठा आवश्यक तत्व है। किसी दूसरे की भाषा, विचार, उपाय, शैली आदि का अधिकांशतः नकल करते हुए अपने मौलिक कृति के रूप में प्रकाशन करना साहित्यिक चोरी है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उच्चत्तर शिक्षा संस्थाओं में अकादमिक सत्य निष्ठा एवं साहित्यिक चोरी की रोकथाम के लिए बनाए गए कानून को प्रत्येक शोधार्थी एवं शिक्षक को समझना चाहिए। ये बातें प्रो. अजय शुक्ला ने कही। वह सोमवार को एचआरडी सेंटर द्वारा साहित्यिक चोरी को लेकर आयोजित 21 दिवसीय पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि साहित्यिक चोरी अर्थात प्लेजरिज्म के 4 लेवल हैं। जहां लेवल जीरो पर किसी तरह की पेनाल्टी नहीं है, जबकि लेवल 3 पर सबसे कड़ी सज़ा यानी रजिस्ट्रेशन रद्द होना है। डिग्री मिल जाने की स्थिति में शोधार्थी का शोध वापस किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में सुपरवाइजर को भी लगातार दो वार्षिक इन्क्रीमेंट का अधिकार नहीं दिया जाएगा और तीन साल के लिए किसी नए मास्टर्स, एमफिल, पीएचडी छात्र या स्कॉलर को सुपरवाइज़ करने की अनुमति नहीं होगी।

व्याख्या के अंदर हो स्त्रोत का विवरण

प्रो. शुक्ल ने कहा कि साहित्यिक चोरी से बचने के अनेक तरीक़े हैं। अपनी व्याख्या के अंदर ही स्त्रोत का विवरण दे देना चाहिए। ऐसी उक्तियों, जिनको नक़ल किया हुआ समझा जा सकता है, उनको उद्धरण चिन्हों में लिखना चाहिए। साहित्यिक चोरी न केवल अकादमिक दृष्टि से बुरी है, बल्कि यदि आप कॉपीराइट भंग करते हैं, तो वैधानिक अपराध भी माना जाएगा।

80 शिक्षक कर रहे हैं प्रतिभाग

अतिथि परिचय एवं स्वागत सेंटर निदेशक प्रो. हिमांशु पांडेय ने किया। आभार ज्ञापन संस्कृत विभाग की डॉ. लक्ष्मी ने किया। द्वितीय सत्र में प्रो. धनंजय कुमार और तृतीय सत्र में प्रो. अजेय कुमार गुप्ता ने व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में बिहार, सिक्किम, राजस्थान समेत कई विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के 80 शिक्षक प्रतिभाग कर रहे हैं।

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