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मच्छर को टक्कर: मच्छरों के खात्मे के लिए संसाधनों को ठीक से हो इस्तेमाल: VIDEO

मच्छर बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं। मच्छरों की वजह से पैदा होने वाली बीमारियों से हर साल हजारों जिंदगियां हलाक हो जा रही हैं। मच्छरों के खात्मे के लिए जरूरी हो गया है कि लोगों में जागरूकता बढ़े। लोग सफाई के प्रति जिम्मेदारियां महसूस करें। हर कोई पूरी कोशिश करें कि वह जहां रहता हो उसके आस-पास जल जमाव न होने पाए। शासन-प्रशासन से जो संसाधन उपलब्ध हैं उनका ठीक तरह से इस्तेमाल किया जाए। मिलकर हाथ बटाएंगे तो मासूमों के हत्यारे मच्छरों का खात्मा हो करना आसान हो जाएगा। मलेरिया, इंसेफेलाइटिस, डे़गू और फाइलेरिया जैसी बीमारियों पर रोक लग जाएगा।

मच्छरों के खात्मे के लिए संसाधनों को ठीक से हो इस्तेमाल
‘हिन्दुस्तान’ द्वारा गुरुवार को आयोजित संवाद ‘मच्छर से टक्कर’ में विभिन्न क्षेत्रों से लोगों ने हिस्सा लिया। मच्छरों के खात्मे के लिए लोगों ने तरह-तरह के उपाय सुझाए लेकिन सबने एक स्वर में कहा कि सफाई को लेकर हर शख्स में जागरूकता आए और शासन-प्रशासन से जो संसाधन मिले हैं उनका ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाए। ऐसा करके ही मच्छरों पर अंकुश लगाया जा सकता है।

होटल क्लार्क में आयोजित ‘संवाद’ में मच्छर जनित रोगों के उन्मूलन के लिए संसाधन की आवश्कता, उपलब्ध संसाधन एवं उसकी उपयोगिता पर चर्चा की गई। इसकी शुरुआत बाल रोग विशेषज्ञ डा. आरएन सिंह ने की। उन्होंने कहा कि मच्छरों से मलेरिया, इंसेफेलाइटिस, डे़गू और फाइलेरिया जैसी बीमारियां होती हैं। इन बीमारियों से हर साल देश में हजारों लोगों की मौत हो जाती है। गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस से सर्वाधिक मौतें होती रही हैं। उन्होंने कहा कि मच्छरों के खात्मे के लिए एरियल फागिंग जरूरी हो गया है। सांस्कृतिककर्मी सुनिषा श्रीवास्तव ने कहा कि बचपन में हम लोगों ने देखा है कि फागिंग करने के लिए लोग आते थे। घर में बना भोजन ढक दिया जाता था। आज लोग वह दृश्य नहीं देख पा रहे हैं। मच्छरों को मारने के लिए गांवों में धुंआ किया जाता था। 

समाजसेवी राजेश मणि ने कहा कि कितनी फागिंग होती है यह किसी से छिपा नहीं है। नालों की सफाई एक साथ नहीं होती। होती भी है तो कचरा सड़क पर छोड़ दिया जाता है। बरसात होने पर वह बहकर पुन: नालों में चला जाता है। कचरे को ढंक कर ले जाना चाहिए लेकिन गोलघर जैसे बाजार में नगर निगम ट्रालियों पर कचरा लादकर खुले में ले जाता है। फ्रांस में मच्‍छर नहीं हैं। सभी वार्डों में एक साथ एक समय पर फागिंग की आवश्‍यकता है। आपदा विशेषज्ञ गौतम ने कहा कि मच्छरों के खात्मे के लिए पूरे वर्ष काम होना चाहिए। विवि छात्र रजनीश दुबे ने कहा कि नालों की सफाई होनी चाहिए।फागिंग भी होनी चाहिए। सफाई और मच्छरों की समस्या कोर्स में शामिल कर बचपन से ही लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। आदर्श पाठक ने कहा कि मैने छात्रावास में एक साल में 2 बार केवल फागिंग होते देखा है।  निधि चतुर्वेदी ने कहा कि हमें जागरूकता दिखानी चाहिए। सफाई पर ध्यान देना चाहिए। वहीं जिम्मेदार विभागों को चाहिए कि वे संसाधनों का सही इस्तेमाल करें। सौरभ उपाध्याय ने कहा कि गांवों में सफाई और फागिंग की कोई व्यवस्था नहीं।

विवि के प्रो. शरद मिश्र ने कहा कि संकल्प शक्ति और संवेदनशीलता की कमी और ऊपर से भ्रष्टाचार। इन्हीं वजहों से इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी फैलती है और बच्चे मर जाते हैं। जो जिम्मेदार हैं वे चुप्पी साधे रहते हैं। अमेरिका जैसा देश भी स्वास्थ्य पर अरबों रुपये खर्च करता है लेकिन इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारी को लेकर गंभीरता न दिखाना दुर्भाग्यपूर्ण है। डा. इमरान अख्तर ने कहा कि मच्छरों की रोकथाम के लिए प्रशासन और जनता दोनों जिम्मेदारी निभाए। डा. वी.के.श्रीवास्‍तव ने कहा कि जब तक हम नालियों में पानी का बहाव नहीं कराएंगे, जल जमाव से मुक्ति नहीं पाएंगे, मच्छर पैदा होते रहेंगे।

जिला मलेरिया अधिकारी डा. एके पांडेय ने कहा कि जल जमाव न होने देना सबसे जरूरी है। उन्होंने बताया कि मलेरिया विभाग ने छिड़काव के लिए वर्ष 2018-19 में 800 लीटर मैलाथियान दिया है। गांवों में छिड़काव के लिए 10 हजार रुपये दिए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर और रकम भेजी जाती है।

मच्छरों से 10 लाख से अधिक मौतें हुई है। इसके रोकथाम के लिए चालू कार्यक्रम के साथ एरियल फॉगिंग जरूरी है। अमेरिका ने जीका वायरस को एरियल फॉगिंग से ही खत्म किया। एरियल फांगिंग से ही प्रभावी अंकुश मच्छरों पर लग सकता है। 
डॉ आरएन सिंह, बाल रोग विशेषज्ञ

मच्‍छर कई बीमारियों के वाहक हैं। इन पर अंकुश जरूर लगाया जाना चाहिए। मौजूदा संसाधन नाकाफी हो रहे हैं।  सरकार और प्रशासन को इस ओर ध्‍यान देना चाहिए। 
सुनिषा श्रीवास्तव, संस्कृतिकर्मी

मच्छर को टक्कर आसान नहीं है। फ्रांस में मच्छर नहीं हैं। पूरे शहर में एक साथ एक घंटे फांगिंग हो तो सुधार दिखेगा। सिर्फ डीजल और पेट्रोल खर्च कर लाखों फूंकने से मच्छरों को टक्कर नहीं दे जायेंगे। निगम और मलेरिया विभाग के पास कितनी फांगिंग मशीनें हैं, यह कोई नहीं जानता है। शहर की गालियों में तो कभी-कभी फांगिंग दिख जाती है, लेकिन गांव की बुरी स्थिति है।  मच्छरों के काटने से बहुत बच्चे इफेक्टिव होते हैं। समाज को भी जागरूक करना होगा। सभी एक हों तो सरकार को मच्छरों पर अंकुश के लिए प्रभावी कदम उठाना होगा।
राजेश मणि, सामाजिक कार्यकर्ता

फांगिंग करने वाला कर्मचारी सिर्फ रस्मी काम करता है। बमुश्किल 10 मिनट की फांगिंग से कोई प्रभाव नहीं नहीं पड़ेगा। मच्छर के खात्में के लिए कई विभागों को मिलकर काम करना होगा। आम सहभागिता भी काफी जरूरी है। जागरूकता ही मच्छरों से बचाव का अहम हथियार है। 
गौतम गुप्ता, जिला आपदा विशेषज्ञ

इंसेफेलाइटिस से पूर्वांचल प्रभावित है। विवि के एनसी हॉस्‍टल में एक साल में दो बार फागिंग हुई। वह भी वार्डेन के व्‍यक्तिगत प्रयास से। कालेज और विश्‍वविद्यालयों मं चलने वाले एनएसएस कार्यक्रमों को गांवों तक पहुंचाना होगा। 
रजनीश दुबे, स्टूडेंट, डीडीयू

इंसेफेलाइटिस से पूर्वांचल प्रभावित है। एक साल में 2 बार फांगिंग हुई, वह भी वार्डेन के ब्यक्तिगत प्रयास से। कालेज और विश्वविद्यालयों में चलने वाले एनएसएस कार्यक्रमों को गांव तक पहुंचाना होगा। स्वास्थ्य पर बजट बढ़ाना चाहिए।
आदर्श पाठक, स्टूडेंट, डीडीयू

मच्छरों पर अंकुश के लिए नगर निगम से लेकर मलेरिया विभाग में लाखों रुपये का बजट आता है, लेकिन इसकी खुलेआम लूट होती है। सरकार को प्रभावी फागिंग के लिए कार्ययोजना बनानी होगी। रस्मी फागिंग से नगर निगम मच्छरों पर अंकुश के लिए खुद की पीठ ठोक लेगा लेकिन कोई असर नहीं दिखेगा। 
रवि श्रीवास्तव, जागरूक नागरिक

मच्छर पर खर्च होने वाला बजट साल दर साल बढ़ रहा है। महीने के बजट में एक हिस्सा मच्छरों के केमिकल का भी होता है। यह केमिकल बच्चों लेकर बड़ों तक के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। आसपास की सफाई रखें तो मच्छर खर्च होने वाले बजट में कमी आएगी।
मनोज कुमार जायसवाल, तकनीकी विशेषज्ञ, आपदा विभाग

मच्छरों को टक्कर तब दे पाएंगे जब हम उसके डंक से होने वाली बीमारी को लेकर जागरूक होंगे। दिक्कत यह है कि सड़क किनारे रखे हुए डस्टबिन के बाद भी सड़क इधर-उधर फेंक दिया जाता है। बच्चों को मच्छर को लेकर जागरूक करना होगा।
निधि चतुर्वेदी, सामाजिक कार्यकर्ता

जिस प्रकार मच्छरों के डंक ने आम जनमानस को प्रभावित किया है, उसे देखते हुए सरकारों को प्रभावी कदम उठाना होगा। मच्छर पर अंकुश लगने से स्वास्थ्य पर बजट कम होगा। नगर निगम और मलेरिया विभाग के पास जो संसाधन हैं, उनका ईमानदारी से प्रयोग होना चाहिए। 
सौरभ त्रिपाठी, स्टूडेंट, विश्वविद्यालय

सरकार ही नहीं आम लोगों को संवेदनशील होना होगा मच्छर को लेकर। हर साल इंसेफेलाइटिस में बच्चे मरते हैं। लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते है। वायरस को लेकर शोध बढ़ाना होगा। गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज का वायरल सेंटर अपग्रेड हो गया है। पूर्वांचल में मच्छरों का जनसंख्या घनत्व काफी अधिक है।  
प्रो शरद कुमार मिश्रा, डीडीयू, बायोटेक्नोलॉजी विभाग

मच्छर के रोकथाम के लिये जनता और प्रशासन को प्रयास करना होगा। कूड़े का निस्तारण ठीक से होना चाहिए। ड्रेनेज ठीक होगा तो जलजमाव नहीं होगा। इससे मच्छरों में प्रजनन कम होगा। बिजली आपूर्ति में सुधार होना चाहिए। मेडिकेटेड मच्छर दानी का प्रयोग करना होगा। 
डॉ इमरान अख्तर, चिकित्सक

एक गांव में फांगिंग के लिए एक लीटर मैलाथियान और 19 लीटर डीजल की जरुरत होती है। नालियों में पानी का बहाव रहे तो फांगिंग की जरूरत ही नहीं होगी। गांव में नालियां निकालना महत्वपूर्ण है। स्थाई वाटर लॉगिंग को हटाना होगा। थर्माकोल को कुंआ में डाल कर मच्छरों का प्रजनन रोक सकते है।
डॉ वीके श्रीवास्तव, कीट विज्ञानी

नगर निगम और मलेरिया विभाग के पास मच्छरों से निपटने के लिए संसाधन हैं, उसे इम्प्लीमेंट करने की जरूरत है। दस्तक अभियान के चलते पिछले साल की अपेक्षा इस बार इंसेफेलाइटिस के मरीज कम आये हैं। हमें मच्छर को टक्कर के साथ मच्छरों भारत छोड़ो का नारा देना होगा। 
डॉ एके पांडेय, जिला मालेरिया अधिकारी

संवाद में निकली बातें
-मच्छरों से कैसे निपटा जाए इसे स्कूल और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
-नालियों में गंदे पानी का ठहराव नहीं हो इसे सुनिश्चित करना होगा।
-नगर निगम और मलेरिया विभाग के पास जो संसाधन हैं उसका ईमानदारी से प्रयोग होना चाहिए।
-शहर का ड्रेनेज सिस्टम को सुधारना होगा।
-शहर के वार्डों में एक घंटे तक एक साथ फागिंग होनी

सिर्फ दिखाने को हैं नगर निगम और मलेरिया विभाग के संसाधन
मच्छरों के डंक से निपटने के लिए नगर निगम और मलेरिया विभाग का बजट साल-दर-साल बढ़ रहा है। बावजूद मच्छरों का इकबाल लगातार बढ़ रहा है। दोनों विभागों के पास जो संसाधन हैं, उनका भी प्रयोग होता नहीं दिख रहा है। नगर निगम की फागिंग मशीनें रस्मी तौर पर कभी-कभी दिख  भी जाती हैं, लेकिन मलेरिया विभाग की मशीनें कागजों में ही संचालित हो रही हैं। गांवों में फागिंग पर खर्च हुए 56 लाख की हकीकत की जांच हो रही है।

नगर निगम में 70 वार्ड हैं। वर्ष 2005 में जब फागिंग को जोर-शोर से शुरू किया गया था तो नगर निगम के पास 85 साइकिल वाली फांगिंग मशीनें थी, जो मच्छरों के प्रकोप बढ़ने के बाद 39 पर सिमट गई है। कागजों में ये साइकिलें रोज निकलती हैं। मशीनों में हजारों लीटर डीजल और पेट्रोल के साथ टेमी फाग केमिकल भी डाली जाती है, लेकिन हकीकत में इसका कोई असर नहीं है। वर्तमान में नगर निगम का जो शिड्यूल है उसके मुताबिक दो वार्डों में एक साइकिल वाली फागिंग मशीने से प्रतिदिन फागिंग हो रही है। प्रत्येक वार्ड के लिए पांच लीटर डीजल और केमिकल उपलब्ध कराई जाती है। पार्षद के निर्देशन में चिन्हित रूट पर फागिंग कराई जाती है।

फागिंग के प्रभारी उदय शंकर का कहना है कि ‘पांच लीटर डीजल में 30 मिनट तक मशीन चलती है।’ एक वार्ड में कई किलोमीटर सड़क और गलियां होती हैं। महज 30 मिनट के फागिंग के असर को आसानी से समझा जा सकता है। वह भी तब जब कर्मचारियों पर डीजल चोरी का कई बार आरोप लग चुका है। फागिंग के लिए 45 आउटसोर्सिंग के कर्मचारियों की तैनाती है। इन्हें ही सभी 70 वार्ड में फागिंग का जिम्मा मिला हुआ है। नगर निगम को मलेरिया विभाग मैलेथियान को उपलब्ध कराता है। चालू वित्तीय वर्ष में मलेरिया विभाग निगम को 800 लीटर मैलेथियान उपलब्ध करा चुका है। 

खड़ी रहती हैं 4 बड़ी फागिंग मशीनें
नगर निगम में मुख्य सड़कों पर फागिंग के लिए 4 बड़ी फागिंग मशीनें भी हैं। इन गाड़ियों पर एक ड्राइवर और तकनीकी स्टॉफ की तैनाती है। एक घंटे की फागिंग कराने के लिए 60 लीटर डीजल और 8 लीटर पेट्रोल का खर्च होता है। ये मशीनें सिर्फ वीआईपी के दौरे के समय ही निकाली जाती हैं। 

गांवों में फागिंग पर खर्च हो गए 56 लाख, नहीं दिखीं मशीनें
नगर निगम और नगर पंचायतों के इतर गांव में फागिंग कराने का जिम्मा मलेरिया विभाग के पास है। मलेरिया विभाग के पास 38 फागिंग मशीनें हैं। ये मशीनें स्वस्थ्य केन्द्रों पर खड़ी रहती हैं। इसके साथ ही जिले की 1365 गांवों में फागिंग आदि के लिए मलेरिया विभाग 10-10 हजार की रकम हर साल देता है। जिसे ग्राम प्रधान और स्वास्थ्य कर्मचारियों की देखरेख में खर्च किया जाता है। जिला मलेरिया अधिकारी डॉ.एके पांडेय का कहना है कि जरुरत पड़ने पर ग्राम सभाओं को 10 हजार से अधिक की रकम भी दी जा सकती है। 

 

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