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रोचक कहानियां: ईद-ईदगाह और कथा सम्राट महान प्रेमचंद के कुछ राज

मुंशी प्रेमचंद

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दरगाह मुबारक खां शहीद मस्जिद के निकट ईदगाह मैदान से हिंदी साहित्य के महान कथाकार प्रेमचंद की स्मृतियां भी जुड़ी हैं। इसी ईदगाह के मैदान में लगने वाले मेले में प्रेमचंद को उनकी ईदगाह कहानी का किरदार ‘हामिद’ मिला था, जो खिलौनों के बजाए अपनी दादी के लिए ईदी में मिले पैसे से लोहे का चिमटा खरीदता है।

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उनकी नजर में प्रेमचंद

31 जुलाई 1880 को लमही बनारस से मात्र चार किलोमीटर दूर जन्मे धनपत राय उर्फ प्रेमचंद का कहानीकार-रचनाकार के रूप में जन्म गोरखपुर में ही हुआ। प्रेमचंद डाक विभाग में मुंशी अपने पिता धनपत राय के स्थानांतरण के बाद 1892 में पहली बार गोरखपुर आए। उस वक्त उनकी उम्र महज 13 साल थी। गोरखपुर में उनका दूसरा प्रवास 19 अगस्त 1916 से लेकर 16 फरवरी 1921 तक रहा। ईदगाह से महज 50 मीटर की दूरी पर मौजूदा प्रेमचंद पार्क की यह ‘प्रेमचंद कुटिया’ उनका सरकारी आवास थी। हालांकि, तब वह ऐसी नहीं था, अब इसका स्वरूप काफी बदल गया है। अब यहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान के रूप में उनका स्मारक और उनके नाम पर प्रेमचंद पार्क। उनकी आदमकद प्रतिमा भी परिसर में स्थापित है। पार्क में बने भित्ती चित्र भी सहज लोगों का ध्यान आकर्षित करते हुए उन्हें कहानियों के किरदारों का स्मरण दिलाते हैं।

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प्रेमचंद को रचनाकार के संस्कार गोरखपुर से ही मिले

‘मेरी पहली रचना’ शीर्षक से लिखे संस्मरण में प्रेमचंद लिखते हैं कि ‘उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था, उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे, मै भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दर्जा कहलाता था। रेती रोड पर बुकसेलर बुद्धिलाल रहता था। मै उसकी दुकान पर बैठता और उसके स्टाल से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था। मगर दुकान में सारे दिन तो बैठ न सकता था,
इसलिए दुकान से अंग्रेजी पुस्तक की कुंजियां और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दुकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो तीन वर्षो में मैंने सारे उन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े।’ यह संस्मरण बताता है कि उनके रचनाकार होने के संस्कार गोरखपुर की सरजमी से बचपन में ही मिले। 

प्रेमचंद का घर और समाज

उनके पुत्र अमृतराय अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद कलम का सिपाही’ में लिखते हैं ‘गोरखपुर के नार्मल स्थित राजकीय दीक्षा विद्यालय में प्रथम सहायक अध्यापक पद पर अपने दूसरे आगमन तक प्रेमचंद्र कथा लेखन में अपनी पहचान बना चुके थे। एवं सरस्वती समेत अपने पत्र पत्रिकाओं में छपी उनकी कथा रचनाएं चर्चे में आने लगी थी। यहां आकर उन्होंने उर्दू में लिखित अपने उपन्यास ‘बाजार ए हुश्न’ का अनुवाद हिंदी में सेवा-सदन नाम से किया। उनकी भेंट हनुमान प्रसाद पोद्दार से हुई जिन्होंने प्रसिद्ध शायर रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को प्रेमचंद से मिलवाया। उसी गोरखपुर प्रवास-काल में सन 1919 में छपे चार उपन्यासों की बदौलत ख्याति हासिल हुई।’

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और गांधी का भाषण सुनने के बाद प्रेमचंद ने त्याग दी नौकरी

प्रेमचंद के जीवन की क्रांतिकारी घटना गोरखपुर में घटित हुई। असहयोग का अलख जगाते हुए 8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी गोरखपुर बाले मियां के मैदान में लोगोंं को संबोधित कर रहे थे। अमृतराय कलम का सिपाही में लिखते हैं कि‘ मुंशी जी(प्रेमचंद) अपनी पत्नी और दोनों बच्चों समेत वहां पहुंचे। घर आए तो गांधी जी की ही बातें दिमाग में घूम रही थीं। पत्नी से बोले तुम राय देती तो सरकारी नौकरी छोड़ देता। पत्नी बोली छोड़ दिजिए नौकरी को। यह सरकारी नौकरी अब सहनशक्ति से बाहर है।’’ यह फरवरी 1921 की 15वी तारीख थी। 16 तारीख को वह कार्यमुक्त हो गए। ईद के मुबारक मौके से जुड़ी ‘ईदगाह’ कहानी की संवेदनशीलता और मनुष्यता प्रेमचंद को कालजयी रचनाकार बनाती है। 

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  • Web Title:Eid Eidgah and Premchand