DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हमारे पितृ पुरुष: डॉ. सरकारी ने की पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस की पहली बार पहचान


हमारे पितृ पुरुष: डॉ. सरकारी ने की पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस की पहली बार पहचान

वर्ष 1978। बीआरडी मेडिकल कालेज में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई। रहस्यमय बुखार से पीड़ित मरीज अस्पताल में दम तोड़ने लगे। मरीजों को तेज बुखार के साथ झटका आ रहा था। ऐसे में मेडिसिन विभाग के डॉक्टर ने बगैर किसी वायरोलॉजिक जांच के सिर्फ लक्षणों के आधार पर बीमारी को जापानी इंसेफेलाइटिस करार दिया। वह थे डॉ. एनबीएस सरकारी।

पूर्वी यूपी में मौत की बीमारी बनी इंसेफेलाइटिस को पहली बार डॉ. सरकारी ने पहचाना। पूर्वी यूपी के डॉक्टरों के लिए यह नया नाम था। इससे पहले इसकी चर्चा सिर्फ किताबों तक ही रही। बगैर किसी पैथोलॉजी व वायरोलॉजी जांच के डॉ. सरकारी द्वारा बीमारी को जापानी इंसेफेलाइटिस नाम देने चिकित्सा विभाग के आला अधिकारियों को नागवार लगा।

डॉ. सरकारी के दावे की सूचना दिल्ली तक के अधिकारियों को लगी। शासन के अधिकारियों ने इस दावे की पड़ताल कराने का फैसला किया। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में रहस्यमय बुखार की वास्तविकता की पड़ताल के लिए दिल्ली से वायरोलॉजी विशेषज्ञों की टीम पहुंची। टीम ने मरीजों से नमूने लिए। जांच रिपोर्ट को देखकर अधिकारी हैरान रह गए। मरीजों के सीरम में जापानी इंसेफेलाइटिस का वायरस मिला।

पोस्टकार्ड भेजकर पूछते थे मरीज का हाल

मर्ज को पहचानने की डॉ. सरकारी की विधा का लोहा उनके साथी भी मानते। अपने दौर में वह सूबे के चंद डॉक्टरों में से रहे जिनकी विशेषज्ञता न्यूरोलॉजी में भी रही। इंसेफेलाइटिस मरीजों के इलाज में उनका रिकार्ड सबसे शानदार रहा। वह अपने मरीजों का हाल 10 से 15 साल तक लेते। हर मरीज का रिकार्ड अपने पास रखते। दूर दराज के मरीजों से बीमारी का हाल जानने के लिए रोजाना पोस्टकार्ड लिखते। मरीजों से मिले जवाब को उनके फाइल के साथ अटैच कर देते। उनके पास करीब पांच हजार मरीजों का रिकार्ड मौजूद रहा। मरीजों पर किए गए उनके रिसर्च को जापान ने भी मान्यता दी। निधन से कुछ महीने पूर्व भी जापान के डॉक्टरों ने उन्हें इंसेफेलाइटिस पर आधारित सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि तलब किया।

रेलवे की नौकरी छोड़कर ब्रिटेन में की पढ़ाई

महानगर के मध्यमवर्गीय परिवार में 1938 में जन्मे डॉ. एनबीएस सरकारी के पिता जंगबहादुर सिंह सरकारी पेशे से वकील थे। मां रामबिलासी घरेलू महिला रहीं। पढ़ाई में वह शुरू से ही मेधावी रहे। सेंट एड्रयूज इंटर कालेज से इंटरमीडिएट करने के बाद कानपुर मेडिकल कालेज से एमबीबीएस और 1962 मेडिसिन से पीजी किया। पढ़ाई पूरी करते ही रेलवे में स्वास्थ्य अधिकारी की नौकरी लगी। रेलवे की नौकरी के दौरान ब्रिटेन के मिडलैंड सेंटर ऑफ न्यूरोलॉजी में फेलोशिप करने का ऑफर मिला। रेलवे की नौकरी छोड़कर वह पढ़ने चले गए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Dr Sarkari recognised Encephelaitis first time in East UP