बशीर की शायरी समय की शायरी, गोरखपुर से था विशेष लगाव
डॉ. बशीर बद्र का जाना साहित्य और मुशायरे की पूरी तहज़ीब का एक युगांत है। उनकी ग़ज़लों की मिठास और रिश्तों की गर्माहट आने वाली पीढ़ियों तक महसूस की जाएगी। डॉ कलीम कैसर के अनुसार, बशीर बद्र की शायरी समय की शायरी थी, जो दिल में उतरती थी।
गोरखपुर, प्रमुख संवाददाता। डॉ. बशीर बद्र का जाना केवल एक शायर का जाना नहीं, बल्कि साहित्य और मुशायरे की पूरी तहज़ीब का एक युगांत है। उनकी ग़ज़लों की मिठास, लफ्ज़ों की सादगी और रिश्तों की गर्माहट आने वाली पीढ़ियों तक महसूस की जाती रहेगी। डॉ. बशीर बद्र को भुला पाना साहित्य जगत के लिए कभी आसान नहीं होगा। उनका रुखसत होना उस दौर का अंत है, जिसने शायरी को महज़ किताबों से निकालकर आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया。
डॉ कलीम कैसर का वक्तव्य
यह कहना है अंतरराष्ट्रीय शायर-कवि एवं संचालक डॉ कलीम कैसर का। उन्होंने कहा कि विगत पंद्रह वर्षों से अधिक समय से वे असाध्य बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन उनकी स्मृतियों, उनकी आवाज़ और उनके शेरों की रौशनी कभी कम नहीं हुई। आज जब वे हमेशा के लिए खामोश हो गए हैं, तब एहसास होता है कि साहित्य का एक पूरा आसमान सूना हो गया है।
पहली भेंट की यादें
डॉ कलीम कहते है कि मेरी उनसे पहली भेंट वर्ष 1978 में हुई थी। उस समय मैं साहित्य की दुनिया में अपने कदम जमा रहा था और वे मंचों के ऐसे सितारे थे, जिनकी मौजूदगी ही नए रचनाकारों के लिए प्रेरणा बन जाती थी। उनमें एक अद्भुत आत्मीयता थी। नए लिखने वालों को वे बेहद धैर्य और अपनत्व के साथ मार्गदर्शन देते थे। शायद यही कारण था कि उनके आसपास युवा रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई। उन्होंने मंचीय कविता और मुशायरे को नई दिशा दी, जिसका प्रभाव आज भी साफ दिखाई देता है।
बशीर की शायरी समय की शायरी
डॉ कमीम कहते हैं कि बशीर बद्र की शायरी समय की शायरी थी। उसमें भाषा का कोई दुरूहपन नहीं था। उनके शब्द सीधे दिल में उतरते थे। वे सबकी खुशियों और दुखों के सहभागी थे। उनकी ग़ज़लों में जीवन की तपिश भी थी और रिश्तों की नमी भी। मुझे आज भी वर्ष 2005 की वह मुलाकात याद है, जब मेरा काव्य संकलन ‘बीर बहूटी’ प्रकाशित हुआ था। मैंने संकोच के साथ उन्हें पुस्तक भेंट की। किताब हाथ में लेते ही मुस्कराकर बोले ,‘अभी मैं इस पर दो शब्द लिखता हूं।’ लगभग पंद्रह मिनट बाद उन्होंने एक कागज मेरे हाथ में देते हुए कहा,‘तुम्हारी किताब में कई शेर ऐसे हैं, जो शायद मैं भी नहीं लिख सकूंगा।’ यह उनका बड़प्पन था, उनका स्नेह था, जो आज भी मेरे लिए अमूल्य धरोहर है।
गोरखपुर से विशेष लगाव
गोरखपुर से उनका विशेष लगाव था। यहां उनका लगातार आना-जाना होता था। उनके मित्र एवं बाबा कंस्ट्रक्शन के मालिक अधिवक्ता काशीनाथ मिश्रा उन्हें अक्सर आमंत्रित करते रहते थे। अंतिम बार वे महात्मा गांधी इंटर कॉलेज के शताब्दी वर्ष के कवि सम्मेलन और मुशायरे में आए थे, जिसमें मुझे भी उनके साथ मंच साझा करने का अवसर मिला था।
भोपाल में हुई आखिरी मुलाकात
डॉ कलीम कहते है कि मेरी उनसे अंतिम मुलाकात वर्ष 2011 में भोपाल के एक साहित्यिक कार्यक्रम में हुई थी। उसके बाद बीमारी ने उन्हें मंच से दूर कर दिया। धीरे-धीरे वे सार्वजनिक जीवन से अलग होते चले गए, लेकिन उनकी शायरी लोगों की ज़िंदगी में लगातार गूंजती रही। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शेर, उनकी मुस्कान, उनका अपनापन और उनकी आवाज़ साहित्य प्रेमियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगी। सच तो यह है कि बशीर बद्र जैसे शायर कभी पूरी तरह विदा नहीं होते, वे अपनी यादों और अपने लफ्ज़ों में हमेशा जीवित रहते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


