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19 सितम्बर, 2020|11:32|IST

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सदियों का इतिहास बता रहे देसी खिलौने

सदियों का इतिहास बता रहे देसी खिलौने

1 / 2बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर में रखे प्राचीन कालीन खिलौने न केवल मन मोह लेते हैं बल्कि यह सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं कि खिलौने समाज के विकास की अहम कड़ी हैं। प्राचीन काल से ही खिलौनों की अहम भूमिका...

सदियों का इतिहास बता रहे देसी खिलौने

2 / 2बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर में रखे प्राचीन कालीन खिलौने न केवल मन मोह लेते हैं बल्कि यह सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं कि खिलौने समाज के विकास की अहम कड़ी हैं। प्राचीन काल से ही खिलौनों की अहम भूमिका...

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बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर में रखे प्राचीन कालीन खिलौने न केवल मन मोह लेते हैं बल्कि यह सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं कि खिलौने समाज के विकास की अहम कड़ी हैं। प्राचीन काल से ही खिलौनों की अहम भूमिका है। यही वजह है कि शुंग, कुषाण, मौर्य और गुप्त काल से लेकर वर्तमान में खिलौने बनाए और बेचे जाते हैं। हर काल में खिलौनों की खूब मार्केटिंग भी होती रही है। रविवार को मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत बनाने में लोकल खिलौनों की भूमिका अहम बताकर इस कारोबार से जुड़े लोगों का उत्साह बढ़ा दिया है।

बौद्ध संग्रहालय में रखी शुंग काल के दो बैलों की छोटी सी मूर्ति यह बयां करने के लिए काफी है कि खिलौनों की तब भी पूछ थी। पहचान थी और खिलौने लोगों को आकर्षित करते थे। कुषाण काल का अश्व और इसी काल की भेड़ गाड़ी बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी आकर्षित करती है। यह सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि तब भी लोगों के हाथों के जादू से खिलौने गढ़े जाते थे। शुंग काल में हाथी पर सवार पुरुष की मूर्ति और बैलगाड़ी का अग्र भाग लुभाता है। कुष्णा काल की मकरयुक्त गाड़ी बौद्ध संग्रहालय की शोभा बढ़ाती है और बच्चों तथा बड़ों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मौर्य काल का हाथी और वर्तमान समय में टेराकोटा के खिलौने बच्चों के मानसिक विकास में सहयोग करते हैं और संदेश देते हैं।

बौद्ध संग्रहालय में सजे प्राचीन काल के खिलौने आकर्षण के केंद्र में हैं। वहीं गोरखपुर को अंतर्राष्ट्रीय पहचान देने वाले टेराकोटा के खिलौने यहां के कारोबारियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात में कहा कि आत्मनिर्भर भारत बनने में लोकल खिलौनों की अहम भूमिका होगी। प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप एवं नए उद्यमियों से खिलौना कारोबार से ज़ुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अब स्थानीय खिलौनों के लिए आवाज बुलंद करने का वक्त आ गया है। प्रधानमंत्री के मन की बात ने खिलौनों के कारोबार से जुड़े लोगों का मनोबल बढ़ा दिया है।

समाज शास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों की राय, बहुत कुछ सिखाते हैं देसी खिलौने

समाज शास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि खिलौने कारोबारियों के लिए आय का जरिया होते हैं लेकिन समाज को बहुत कुछ सिखाते भी हैं। खिलौनों का कारोबार प्राचीन काल से है। यह समाज को आत्मनिर्भर बनाने में मददगार होते हैं।

बोले जानकार

बौद्ध संग्रहालय में शुंग, कुषाण, गुप्त और मौर्य काल से लेकर वर्तमान में टेराकोटा तक के खिलौने हैं। खिलौने बच्चों को आकर्षित करते हैं और उन्हें सोचने के लिए मजबूर करते हैं। इन खिलौनों को देखकर बच्चे सीखते भी हैं। बड़ों को भी ये खिलौने आकर्षित करते हैं। जानकारियां देते हैं।

मनोज गौतम, उप निदेशक, बौद्ध संग्रहालय

खेल और मानसिक विकास का धनात्मक संबंध होता है। खेल और खिलौने बच्चों का मानसिक विकास करते हैं। बच्चे खिलौने से परिवेश और कल्चर के बारे में सीखता है। बच्चा प्रतीकों को सीखता है। बच्चों की लर्निंग अपने परम्पराओं के बारे में होती है। इससे बच्चों में सृजनात्मकता आती है।

प्रो.सुषमा पांडेय, मनोविज्ञान विभाग, डीडीयू

खिलौने में संदेश छिपा होता है। जिससे बच्चे का समाजीकरण होता है। पारंपरिक खिलौने से परम्परा और संस्कृति की जानकारी होती है। खिलौने के माध्यम से बच्चा उसके प्रतिरूप को ग्रहण करने का प्रयास करता है। बालमन पर समाजिकता का बोध कराने का साधन होता है।

प्रो.मानवेन्द्र सिंह, समाजशास्त्र विभाग, डीडीयू

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  • Web Title:Desi toys telling the history of centuries