DDU looting budget on electricity of teachers and employees - शिक्षकों-कर्मचारियों की बिजली पर बजट लुटा रहा डीडीयू DA Image
14 दिसंबर, 2019|11:00|IST

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शिक्षकों-कर्मचारियों की बिजली पर बजट लुटा रहा डीडीयू

शिक्षकों-कर्मचारियों की बिजली पर बजट लुटा रहा डीडीयू

गोरखपुर विश्वविद्यालय प्रशासन कैंपस की आवासीय कॉलोनियों में रहने वालों की बिजली पर अपना बजट लुटा रहा है। हालत यह है कि अब भी विवि कैंपस में रहने वाले महज 4.05 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली का बिल जमा करते हैं। शेष 3.65 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली बिल का भुगतान विवि प्रशासन करता है। पुरुष छात्रावासों की हालत तो बिजली को लेकर बेहद खराब है। सभी कमरों में हीटर पर खाना व नाश्ता आदि बनाया जाता है। इसके चलते कैंपस में अक्सर बिजली फाल्ट होता है।

विवि कैंपस में 2013 से बिजली बिल की दर नहीं बढ़ी जबकि आम लोगों के लिए आज बिजली बिल की दर 7.70 रुपये प्रति यूनिट पहुंच चुकी है। बिजली विभाग डीडीयू को कामर्शियल रेट से ही बिजली की सप्लाई करता है। डीडीयू के बिजली अभियंता का कहना है कि कैंपस के आवासों में लगे एसी से मीटर नहीं जुड़ा है। इस पर खर्च हो रही बिजली का बिल भी विवि प्रशासन को अपने बजट से भुगतान करना पड़ता है। जबकि एसी का किराया अलग से फिक्स है, जो बिल की अपेक्षा बेहद कम है। विवि प्रतिवर्ष करीब 1.77 करोड़ रुपये का बिजली बिल भुगतान करता है। जबकि हर महीने विवि बिजली बिल के रूप में ढाई से तीन लाख रुपये ही वसूल पाता है। डीडीयू के बिजली अभियंता श्रवण कुमार कहते हैं कि उन्होंने हर बार विकास समिति में इसका प्रस्ताव रखा है।

विकास समिति में नहीं बन रही एक राय

पिछले तीन वर्ष में तीन बार विकास समिति में बिजली बिल की दरों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन कभी भी निर्णय नहीं हो सका। यही नहीं, एसी उपयोग के लिए नियम कड़े करने के प्रस्ताव पर भी एक राय नहीं बन रही। कैंपस के बिजली उपभोक्ताओं का एक बड़ा वर्ग इस दर में कोई बदलाव नहीं चाहता। हालांकि कैंपस में ऐसे उपभोक्ता भी हैं जो बिजली खर्च के वास्तविक दर से भुगतान करने को तैयार हैं।

प्री पेड मीटर लगे न अंडरग्राउंड हुई बिजली की केबिल

डीडीयू कैंपस में शासन ने बिजली की केबिल अंडरग्राउंड कराने का निर्देश दिया था। इसी के साथ आवासों में व्यवस्थित ढंग से मीटर लगाने की बात भी आई थी। प्रीपेड मीटर लगाने का प्रस्ताव बना मगर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अंडरग्राउंड केबिल बिछाने की चार साल पहले शुरुआत हुई मगर शुरू होते ही इसमें भ्रष्टाचार का मामला उजागर हो गया। इसके बाद जांच के नाम पर काम ठप हो गया तबसे अब तक उस पर कोई निर्णय नहीं हो सका। इस प्रस्ताव को विवि की विकास समिति के समक्ष रखा गया तो ज्यादातर सदस्य इस विषय पर चर्चा के लिए तैयार ही नहीं थे, जैसे-तैसे मीटर लगाए जाने के मसले पर बाद में विचार करने की बात तय करते हुए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

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