cm yogi adityanath remembered mahant digvijaynath and mahant avaidyanath in gorakhnath temple of gorakhpur - महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि माना: योगी आदित्यनाथ DA Image

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महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ ने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि माना: योगी आदित्यनाथ

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ब्रहमलीन महंत दिग्विजयनाथ एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने राष्ट्रधर्म को सभी धर्मो सर्वोपरि मानते थे। उनका मानना था कि भारत को सर्वोपरि बने रहने की कुंजी हिन्दू धर्म और संस्कृति ही है। महंत दिग्विजयनाथ ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया बल्कि अपनी दो महाविद्यालय समेत पूरी सम्पत्ति दान कर गोरखपुर विश्वविद्यालय के स्वप्न को साकार किया। 

गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ मंगलवार को स्मृति भवन सभागार में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 50वीं पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ आनन्दमठ की सन्यासी परम्परा की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का आरोप लगा। चौरीचौरा काण्ड में महन्त दिग्विजयनाथ आरोपित किए गए। गोरक्षपीठ ने उस सन्यासी परम्परा का अनुशरण किया जो मानती रही है राष्ट्रधर्म ही हमारा धर्म है। राष्ट्र की रक्षा भी सन्यासी का प्रथम कर्तव्य है। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वरों की यह परम्परा सदैव अनुसरण की जाएगी। 

गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय महंत दिग्विजयनाथ को 
सीएम योगी ने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना का पूरा श्रेय महंत दिग्विजयनाथ को है। महंत दिग्विजयनाथ की पहल और उनके अर्हिनश प्रयत्न से ही गोरखपुर में विश्वविद्यालय की स्थापना हो सकी। महंत दिग्विजयनाथ ने यदि अपने दो महाविद्यालयों समेत पूरी सम्पत्ति विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दान न की होती तो गोरखपुर में विश्वविद्यालय का सपना अधूरा रहता। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने महंत दिग्विजय नाथ की इच्छा का सम्मान किया। आज गोरखपुर उच्च शिक्षा का एक प्रतिष्ठित केन्द्र बना  है।

गोरक्षपीठाधीश्वरों ने राष्ट्रधर्म का संदेश दिया
सीएम ने कहा कि पीठाधीश्वरों में स्पष्ट संदेश दिया कि व्यक्तिगत धर्म से राष्ट्रधर्म बड़ा है। व्यक्ति विकास के लिए राष्ट्र का विकास अनिवार्य शर्त है। समर्थ भारत और समृद्धि की पूरी परिकल्पना भारत के संविधान में निहित है। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने भारत का जैसा संविधान दिया, वह उसी भारत के निर्माण का आधार है जैसा हम चाहते है। भारतीय संस्कृति में छुआछूत, ऊॅचनीच जैसी किसी भेदभाव को स्थान प्राप्त नहीं है, भारत का  संविधान भी यह कहता है। 

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