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चुनावी मुद्दा: इंसेफेलाइटिस ने छीन ली बोलने-सुनने की क्षमता इलाज में जमीन हो गई गिरवी

पिपराइच के अमवा गांव निवासी 17 वर्ष का राहुल। बोलने, सुनने में असमर्थ। मानसिक व शारीरिक रूप से भी आंशिक दिव्यांग। पिता रामक्षितिज और मां सनला अपने इकलौते पुत्र को गोद में लिए बताते हैं कि छह वर्ष की उम्र में हंसते-खेलते राहुल की जिंदगी को नवकी बीमारी ने वीरान कर दिया। पिछले 11 साल से इलाज करा रहे हैं। दोनों हर दूसरे या तीसरे महीने बीआरडी मेडिकल कालेज से लेकर लखनऊ पीजीआई तक की दौड़ लगाते हैं। इलाज में हर साल करीब 80 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं।

रामक्षितिज बताते हैं कि करीब 30 डिस्मिल पुश्तैनी जमीन थी। बेटे के इलाज के खर्च के लिए उसे गिरवी रखना पड़ा। यह रकम खर्च हो गई तो रिश्तेदारों से कर्ज लेना पड़ा। करीब तीन लाख रुपये रिश्तेदारों के कर्ज हो गए हैं। अब मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहा हूं। 
पीड़ितों से दूर है सरकारी सहायता : उन्होंने बताया कि तेज बुखार और झटके की बीमारी ने बेटे के सुनने और बोलने की क्षमता छीन ली। दिमाग और शरीर के दूसरे अंग प्रभावित हुए। बीआरडी के डॉक्टरों ने पीजीआई रेफर कर दिया। अब वहीं से इलाज चल रहा है। आज तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली।  

नवकी बीमारी में हर दशक में नई थ्योरी चूहों से फैल रहा स्क्रब टॉयफस
इंडियन काउंसिंल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की यह सबसे नई थ्योरी है। वैज्ञानिकों के मुतबिक इंसेफेलाइटिस की वजह स्क्रब टॉयफस है। यह बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। यह बैक्टीरिया एक खास प्रकार के कीड़े के लार में होता है। यह कीड़ा बड़े घास के मैदान, चूहों या गिलहरियों के शरीर में रहता है। इसे चीलर भी कहते हैं। यह कीड़ा जब छोटे बच्चों को काटता है तो लार के जरिए बैक्टीरिया बच्चों के खून में मिल जाता है। इससे मरीज की मौत भी हो सकती है। आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने दावा किया कि एईएस के 60 फीसदी मरीजों में स्क्रब टॉयफस के लक्षण मिले। 

क्यूलेक्स मच्छर से हो रही इंसेफेलाइटिस
90 दशक के अंत में पहली बार इस बात की तस्दीक हुई कि बीमार बच्चों में फ्लेवी वायरस से हो रहा है। इस वायरस की पहली बार पहचान जापान में हुई। इसलिए इसे जापानी इंसेफेलाइटिस भी कहते हैं। इस वायरस का वाहक सुअर या बकुला होता है। इंसानों को यह बीमारी क्यूलेक्स मच्छर काटने से होती है। यह मच्छर धान के खेतों में पाया जाता है। मच्छर जब सुअर या बगुला का खून चूसता है तो वायरस उसके शरीर में आ जाता है। मच्छर इंसानों का खून चूसता है तो वायरस शरीर में आ जाता है।

गंदे पानी से हो रही है इंसेफेलाइटिस 
जेई टीकाकरण के बावजूद मरीजों की संख्या कम न होने पर वैज्ञानिकों ने इंट्रो वायरस थ्योरी इजाद की। उस समय दावा किया गया कि इंसेफेलाइटिस के 80 फीसदी मरीज इसी वायरस से पीड़ित हैं। इसके मुताबिक दूषित या संक्रमित जल के सेवन से इंसेफेलाइटिस हो रही है। इसके चार प्रकार है। पोलियो इंसेफेलाइटिस, नॉन पोलियो इंसेफेलाइटिस, कॉक्सकी और इको वायरस। यह वायरस शरीर में श्वसन तंत्र, आहार तंत्र व तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है। 

सिर दर्द से होती है बीमारी
दिमागी बुखार मेनिन्गोकोकस नामक बैक्टीरिया से होता है। इसे मेनिनजाइटिस भी कहते हैं। मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में सूजन आ जाती है। सही से इलाज न होने पर यह जानलेवा साबित होता है। दावा किया जाता है कि इंसेफेलाइटिस के करीब तीन फीसदी मरीजों में यह बैक्टीरिया ही मुख्य कारक है। इसके साथ ही टीबी का बैक्टीरिया जब दिमाग पर असर डालता है तो इसे ट्यूबर क्लोसिस मेनिनजाइटिस कहते हैं। करीब दो फीसदी मरीजों में इसकी तस्दीक हुई। इसके अलावा हरपीज, मलेरिया, टायफाइड से तीन फीसदी बीमार हो रहे हैं। 

बीआरडी में दो साल में डेढ़ गुना बढ़े बेड और संसाधन
पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस के मरीजों के इलाज का सबसे बड़ा केन्द्र बीआरडी मेडिकल कालेज है। यहां शासन ने दो सालों में संसाधन और बेड दो गुना कर दिया। बालरोग विभाग के इंसेफेलाइटिस वार्ड में बेड 268 से बढ़ा कर 428 कर दिये गये। नर्सों की संख्या भी दो गुनी हो गई। छह शिक्षक और 63 नॉन पीजी रेजीडेंट के नए पद सृजित हुए। प्रदेश सरकार ने इंसेफेलाइटिस वार्ड में 37 बेड का हाई डिपेंडेंसी यूनिट शुरू किया। गांव में इलाज के लिए सीएचसी में तीन-तीन बेड के मिनी आईसीयू बनाये गये। जिला अस्पताल में पीडियाट्रिक आईसीयू में पांच बेड बढ़ाए गए। सभी में आधुनिक वेंटिलेटर लगाए गए। 

बीआरडी में भर्ती मरीज और मौतों की संख्या
वर्ष    भर्ती    मौत
1978    274    58
1979    109    26
1980    280    66
2005    3532    937
2006    1940    431
2007    2423    516
2012    2517    527
2013    2110    619
2014    2208    616
2017    2247    511
2018    1047    166
2019 (अबतक)        55    13
(नोट : आंकड़े बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के हैं)

ये जिले हैं प्रभावित
गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज, देवरिया, बस्ती, संतकबीर नगर, सिद्धार्थनगर, गोंडा, आजमगढ़, बलरामपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, श्रावस्ती, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, शाहजहांपुर बिहार व नेपाल

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  • Web Title:Children lost their hearing and listening due to Encephalitis in Gorakhpur