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24 मई, 2020|8:10|IST

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क्वारंटीन सेंटर में बदइंतजामी, ट्राली व बगीचे में बनाया बसेरा

क्वारंटीन सेंटर में बदइंतजामी, ट्राली व बगीचे में बनाया बसेरा

लाकडाउन में कामगार हजारों किमी लंबा सफर तय कर किसी तरह अपने गांव-घर तो आ गए। लेकिन बदहाली के चलते गांव की माटी में भी सुकून नहीं मिला। गांव के पंचायत भवन और स्कूल में बने क्वारंटीन सेंटर में बदइंतजामी से उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जगदीशपुर के कई कामगार घर से ट्राली मंगाकर उस पर डेरा बनाए हुए है। दिन बागीचे में और रात ट्राली पर गुजार रहे हैं। इन कामगारों का कहना है कि घर छोटा होने से होम क्वारंटीन नहीं हो सकते है।

बांसगांव क्षेत्र के ग्राम जगदीशपुर में एक दर्जन प्रवासी कामगार दूसरे प्रदेशों से लौटे हैं। उन्हें 14 दिन क्वारंटीन करने के लिए गांव के बाहर पंचायत भवन में क्वारंटीन सेंटर बनाया गया है। लेकिन पंचायत भवन में बिजली, पानी व शौचालय की बदइंतजामी से अधिकतर कामगार दूसरे विकल्प तलाशने लगे। पंचायत भवन में आधा दर्जन प्रवासी कामगार रुके है शेष होम क्वारंटीन हैं। क्वारंटीन सेंटर में केवल वही कामगार हैं, जिनके घर छोटे है। वे क्वारंटीन सेंटर की बदइंतजामी से परेशान होकर बागीचे में डेरा डाले हुए हैं।

पेड़ की छांव में दिन, ट्राली पर कटती है रात

क्वारंटीन सेंटर में रह रहे प्रवासी कामगार नरसिंह, कैलाश, हरिनाथ यादव, अमरनाथ यादव, सुभाष, फयनाथ कन्नौजिया आदि ने बाग में घर से ट्राली मंगाकर उस पर डेरा बनाया है। इन लोगों का दिन बगीचे में पेड़ों की छांव में गुजरता है। सांप बिच्छू जैसे जहरीले जानवरों से बचने के लिए रात में ट्राली पर मच्छरदानी लगाकर सोते है।

घर से मंगाते हैं खाना-पानी

क्वारंटीन सेंटर पर बदइंतजामी की हालत यह है कि पीने का पानी भी मयस्सर नहीं है। त्रिलोकी, जयप्रकाश, मुन्ना, केशचंद आदि का कहना है कि उन लोगों का चाय नाश्ता और भोजन के अलावा पानी भी घर से ही आता है। त्रिलोकी अहमदाबाद से, जयप्रकाश दिल्ली से, मुन्ना बंगलुरू से और केशचंद्र मुम्बई लौटे हैं। इन सभी कहना है कि क्वारंटीन सेंटर पर बिजली पानी का कोई इंतजाम नहीं है। भोजन और नास्ता घर से मंगाना पड़ रहा है।

साइकिल से 7 दिन में 1700 किमी का सफर

जगदीशपुर गांव के नरसिंह आंध्र प्रदेश के राज मण्डी में पेन्ट पालिश करते थे। लॉकडाउन में काम ठप हो गया। लाकडाउन के दूसरे चरण तक काम चला। जेब में पैसे खत्म होने के बाद गांव लौटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा। सवारी नहीं मिली तो उसने साइकिल से निकलना ही मुनासिब समझा। सात दिन में गांव आ गया। 1700 किमी के सफर में नरसिंह ने कुछ दूरी सायकिल और कुछ ट्रक और ट्रेलर से तय की।

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  • Web Title:Built in a quarantine center bad faith trolley and garden