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29 नवंबर, 2020|3:58|IST

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होम आइसोलेशन में एंटीबॉडी का धोखा, दोबारा संक्रमण का खतरा

होम आइसोलेशन में एंटीबॉडी का धोखा, दोबारा संक्रमण का खतरा

होम आइसोलेशन में रहने वाले ज्यादातर संक्रमितों में निगेटिव होने के बाद पर्याप्त एंटीबॉडी नहीं बन रही है। इससे उनके दोबारा संक्रमित होने का खतरा बना हुआ है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में प्लाज्मा थेरेपी शुरू हो गई है। इसके लिए चार लोगों ने प्लाज्मा दान किया है। होम आइसोलेशन में रहकर निगेटिव हो चुके लोग भी प्लाज्मा दान को लेकर उत्साहित हैं। ऐसे लोग बीआरडी मेडिकल कॉलेज और प्राइवेट पैथोलॉजी में जांच करा रहे हैं तब एंटीबॉडी न बनने की समस्या सामने आ रही है।

होम आइसोलेशन के 50 फीसदी में मानक से कम मिली एंटीबॉडी

संक्रमण में सबसे ज्यादा रहस्यमय एंटीबॉडी का निर्माण हो गया है। होम आइसोलेशन में रह रहे एसिम्प्टोमेटिक संक्रमितों में एंटीबॉडी सबसे कम बन रही है। बीआरडी में अब तक 78 लोगों ने आईजीजी टेस्ट के जरिए एंटीबॉडी की पहचान कराई है। इसमें होम आइसोलेशन में इलाज कराने वाले 60 लोग शामिल हैं। जिनमें 30 में एंटीबॉडी बेहद कम मात्रा में मिली। कुछ में तो नगण्य ही रही। मेडिकल कॉलेज में भर्ती रहे 18 लोगों ने एंटीबॉडी की जांच कराई। जिसमें से एक में एंटीबॉडी बेहद कम मात्रा में मिली जबकि 17 में पर्याप्त एंटीबॉडी मिली।

प्राइवेट पैथोलॉजी में 300 से अधिक लोग करा चुके हैं एंटीबॉडी जांच

प्राइवेट पैथोलॉजी में लोग सर्वाधिक एंटीबॉडी जांच करवा रहे हैं। पैथोलॉजी संचालकों के मुताबिक अब 300 से अधिक लोग एंटीबॉडी जांच करवा चुके हैं। इनमें ढाई सौ संक्रमित रहे थे। जबकि 50 ऐसे थे जिनमें संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई थी। इनमें 50 फीसदी में एंटीबॉडी मानक से अधिक मिली। जबकि आधे में मानक से काफी कम एंटीबॉडी मिली है।

1.4 टाइटर से अधिक होनी चाहिए एंटीबॉडी

पैथोलॉजिस्ट डॉ. राजेश राय ने बताया कि सामान्यत: किसी वायरस से संक्रमित होने पर एंटीबॉडी बनती है। कोरोना भी वायरस संक्रमण है। एजीजी जांच द्वारा एंटीबॉडी की पहचान की जाती है। एक सामान्य संक्रमित में संक्रमण के दो हफ्ते बाद 1.4 टाइटर एंटीबॉडी होनी चाहिए। कुछ मामलों में तो यह 0.3 टाइटर मिला है। जबकि कुछ संक्रमितों में मानक से चार से छह गुना अधिक एंटीबॉडी मिली है।

दोबारा संक्रमित हो सकते हैं लोग

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजिस्ट डॉ. राजेश राय ने बताया कि ऐसे लोग बड़ी संख्या में मिले हैं जिनमें एंटीबॉडी मानक से काफी कम मिली है। यह उनके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी को दर्शाता है। ऐसे लोग दोबारा संक्रमित होने के खतरे की जद में हैं। जिन लोगों में एंटीबॉडी कम है। उन्हें ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।

लक्षण न होने पर नहीं बनती एंटीबॉडी

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. राजकिशोर सिंह ने बताया कि जिन मरीजों में कोरोना संक्रमण के लक्षण नहीं आए। उनमें एंटीबॉडी बनने की संभावना बेहद कम है। ऐसे मरीज दोबारा संक्रमित होने के लिए संवेदनशील होते हैं। ऐसे मामले सामने आए हैं। जिनमें मरीजों में एंटीबॉडी कम बनी है ।

खांसी और बुखार के मरीजों में ज्यादा बनती है एंटीबॉडी

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. अमरेश सिंह ने बताया कि अभी तक एंटीबॉडी को लेकर कोई ठोस नियम नहीं है। फिर भी यह देखा गया है कि जिन मरीजों में खांसी और बुखार के लक्षण रहे हैं, उनमें एंटीबॉडी जरूर बनी है। यह मरीज को वायरस से बचाती है। दोबारा संक्रमित नहीं होने देती। जिन संक्रमितों में एंटीबॉडी कम या नहीं बनी ऐसे मामलों के डाटा पर शोध किया जाएगा।

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  • Web Title:Antibody cheats in home isolation risk of re-infection