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23 जनवरी, 2020|2:10|IST

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92 साल के डा.सेठ आज भी कर रहे गरीबों का मुफ्त इलाज: Video

बीआरडी मेडिकल कालेज के जूनियर डॉक्टरों ने बुधवार को एक बार फिर एक मरीज के तीमारदारों की बुरी तरह पीट दिया। ऐसी घटनाओं के बारे में जानकर आपका मन जरूरी दु:खी होता होगा लेकिन यदि इससे डॉक्टरी पेशे के बारे में कोई राय बना रहे हों तो एक बार बेतियाहाता में डा.नरेन्द्र मोहन सेठ की क्लीनिक देख आएं। 

जवानी में चंदे से बनवा दिया था सीतापुर आई हास्पिटल 
बंटवारे के वक्त लाहौर के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में एमबीबीएस थर्ड इयर के थे छात्र
भारत आकर पटना से एमबीबीएस, पंजाब से एमएस की पढ़ाई की
क्लीनिक में आज भी रहती है सामान्य मरीजों के अलावा रिक्शा चालकों और मजदूरों की भीड़

जी हां, वही डा.सेठ जिन्होंने जवानी के दिनों में चंदे से शहर के बीचोबीच दो एकड़ जमीन पर गरीबों के लिए सीतापुर आई हास्पिटल बना दिया। आज 92 साल की उम्र में भी गरीबों का मुफ्त इलाज कर रहे हैं। उनके क्लीनिक के बाहर बोर्ड पर अब भी लिखा है,‘यहां रेलवे कुली, रिक्शा चालक, असहाय मरीजों और उनके परिवारीजनों का इलाज मुफ्त होता है।’ निजी क्षेत्र में ऐसे एलानिया मुफ्त इलाज करने वाले बिरले हैं लेकिन डा.सेठ की कहानी बस इतनी नहीं है। 

मुल्क के बंटवारे में अपना बड़ा मकान, जमीन, जायदाद और 19 साल तक की जिन्दगी की तमाम यादें लाहौर की गलियों में छोड़ आए डा.सेठ की 66 साल की प्रैक्टिस एक से बढ़कर एक रोचक किस्सों से भरी है। बंटवारे के वक्त वह लाहौर के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में एमबीबीएस थर्ड इयर के छात्र थे। ज्यों-ज्यों अंग्रेजों के जाने की तारीख करीब आ रही थी फिज़ाओं में नफरत की गंध फैल रही थी। यह गंध जब जलते घरों और कत्लेआम कराने को अमादा जलसों में तब्दील होने लगी तो सेठ परिवार ने जुलाई 1947 में लाहौर छोड़ दिया। तमाम दुश्वारियों से गुजरते माता-पिता, बहनों के साथ नरेन्द्र दिल्ली पहुंचे। वहां रिफ्यूजी कैंप में रोज अखबार में अपने मुकद्दर की खबर तलाशते। एक दिन पता चला कि पाकिस्तान से आए मेडिकल छात्रों को हिन्दुस्तान के तमाम मेडिकल कालेजों में शिफ्ट किया जा रहा है। नरेन्द्र मोहन सेठ को 30 दूसरे छात्रों के साथ पटना मेडिकल कालेज मिला। वहां भी हॉस्टल की बजाए शुरुआती दिन कैंप फिर मंदिर में कटे। बहरहाल, 1950 में एमबीबीएस और 1952 में एमएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद सीतापुर के आई हास्पिटल में उन्होंने ज्वाइन किया। नरेन्द्र के काम से प्रभावित उनके सीएमएस ने एक दिन उन्हें बुलाकर कहा, ‘आप गोरखपुर चले जाइए। वहां गरीबों के लिए इलाज कराना काफी मुश्किल है। ऐसा ही एक अस्पताल वहां भी बन जाए तो बड़ी सुविधा होगी।’

धुन के पक्के डा.सेठ तुरंत गोरखपुर आ गए। यहां बड़ी कठिनाइयां झेलते हुए रीड साहब की धर्मशाला में अपना अस्पताल खोला। कुछ ही दिनों में अस्पताल चल निकला। वहां लोगों की भीड़ लगी रहती थी। डा.सेठ ने अपनी मेज पर अस्पताल के चंदे के लिए एक बॉक्स रख दिया था। उनके हाथों लोग ठीक होकर जाते तो रुपया-दो रुपया बॉक्स में डाल देते। उन्हीं रुपयों से 1953 में सीतापुर आई हास्पिटल का पहला ब्लॉक बनकर तैयार हुआ। सात वर्षों में करीब 20 हजार रुपए जुटे तो धीरे-धीरे यह डेढ़ सौ बेड के बड़े अस्पताल में तब्दील हो गया। अस्पताल के लिए दो एकड़ जमीन रईस मुग्गन बाबू ने अपनी मां के नाम पर दी जिनका ऑपरेशन डा.सेठ ने किया था। 

साइकिल, हाथी, बैलगाड़ी जो मिलता उसी से मरीजों तक पहुंचते थे डा.सेठ 
जो गरीब डा.नरेन्द्र मोहन सेठ के पास नहीं पहुंच पाते, डा.सेठ उन तक पहुंच जाते थे। फिर चाहे साइकिल, हाथी, बैलगाड़ी जिसकी सवारी करनी पड़े। ऐसे ही एक चिकित्सा शिविर में दो सौ मरीजों का इलाज करने के बाद निचलौल से बैलगाड़ी से सिसवा जा रहे डा.सेठ को डाकुओं ने घेर लिया था लेकिन उनके बारे में जानने के बाद छोड़ दिया। 

13 साल बाद लाहौर जाकर देखा अपना घर 
डा.सेठ बंटवारे के 13 साल बाद 1960 में बतौर रोटरी क्लब सदस्य एक कांफ्रेंस में शामिल होने लाहौर गए थे। कांफ्रेंस की अगली सुबह वह अपने घर गए जो तब तक वहां के किसी व्यक्ति को एलॉट हो चुका था। डा.सेठ ने अपने घर की उजाड़ हालत देखी। जिस घर में बड़े शान से जिंदगी के 19 साल गुजारे थे उसकी ऐसी हालत देख डा.सेठ बुरी तरह दु:खी हुए। वह बिना मकान के अंदर गए या मकान मालिक से मिले चुपचाप वापस लौट आए। 

जिंदगी का फलसफा 
डा.सेठ कहते हैं कि उन्हें बड़ी तसल्ली है कि जीवन में औरों के लिए कुछ किया। हर शख्स को इंसान होने का फर्ज पूरा करने के लिए कुछ न कुछ खास करना चाहिए। 

जन्मदिन पर सहभोज 
डा.सेठ अपने जन्मदिन पर आज भी हर साल सहभोज करते हैं। दवा विक्रेता संघ के आलोक चौरसिया बताते हैं कि इस सहभोज में उनकी लेन में ठेला-खोमचा लगाने वालों से लेकर दुकान चलाने वाले तक एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। 
 

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