
बोले गोण्डा : जर्जर पाइप लाइनों में लीकेज, घरों तक पहुंच रहा गंदा पानी
Gonda News - गोण्डा में शुद्ध पेयजल की स्थिति चिंता का विषय है। कांशीराम कॉलोनी और मालवीय नगर में पुरानी पाइपलाइनों के कारण प्रतिदिन हजारों लीटर पानी सड़कों और नालियों में बह रहा है। लोगों को दूषित पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बना हुआ है।
घर-घर शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए केन्द्र व सूबे की सरकारों की ओर से कई योजनाएं संचालित है। यहां तक शहरी क्षेत्रों में अत्याधुनिक तरीके से पेयजल पहुंचाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पानी की टंकियों के निर्माण से लेकर आटोमेशन के जरिए उसके संचालन पर जोर दिया जा रहा है। पाइप लाइनों में सतत सुधार व बदलाव किए जा रहे हैं। गोण्डा। शहर में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के दावे जितने ऊंचे हैं, हकीकत उतनी ही बदहाल। कांशीराम कॉलोनी से लेकर डेढ़ सौ साल पुराने मालवीय नगर, पटेल नगर तक जर्जर और पुरानी पाइपलाइनों से रोज़ाना हजारों लीटर साफ पानी सड़कों, नालियों और सीवर में बह रहा है।
कहीं पाइप फूटी हैं, कहीं जोड़ खुले पड़े हैं तो कहीं पेयजल की लाइनें नालों और सीवर के बिल्कुल सटे होकर गुजर रही हैं। नतीजा यह कि लोगों तक पहुंचने से पहले ही शुद्ध पानी दूषित हो रहा है और नागरिक बीमारियों के खतरे में जीने को मजबूर हैं। नई कॉलोनी, पुरानी समस्या कांशीराम कॉलोनी वर्ष 2007 में बसी। उद्देश्य था कि शहरी गरीब और मध्यम वर्ग को योजनाबद्ध बसावट, पक्की सड़कें, साफ पानी, सीवर और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलें। लेकिन 18 साल बाद भी कॉलोनी के कई ब्लॉकों में वही पुरानी कहानी है-फूटी पाइपलाइनें, कम दबाव में पानी, गंदे नालों से सटी पेयजल लाइनें और जगह-जगह रिसाव। सुबह-शाम पानी आने के समय सड़कों पर बहता पानी लोगों की आंखों में चुभता है, क्योंकि यह वही पानी है, जिसके लिए वे हर महीने बिल चुकाते हैं, वह नहीं मिलता है। डेढ़ सौ साल पुराना मालवीय नगर व पटेल नगर की आबादी करीब 40 हजार बताई जाती है। यह दोनों इलाके शहर की पुरानी बसावट का अहम हिस्सा है। समय के साथ यहां की आबादी बढ़ती गई, लेकिन बुनियादी ढांचा उस रफ्तार से नहीं बढ़ा। कई हिस्सों में आज भी दशकों पुरानी लोहे की पाइपलाइनें लगी हैं, जिनमें जंग लग चुकी है। जगह-जगह से पानी टपकता रहता है। बारिश के दिनों में हालात और बिगड़ जाते हैं। नालों का पानी पेयजल लाइन में घुसने की आशंका बढ़ जाती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार पानी से बदबू आती है, रंग बदल जाता है, लेकिन शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं होता। शुद्ध पानी की जगह बीमारियों का खतरा पेयजल और सीवर लाइन का पास-पास होना सिर्फ तकनीकी खामी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक पेट के संक्रमण, दस्त, टायफाइड, पीलिया जैसी बीमारियों का खतरा बना रहता है। महिलाएं, जो घर के कामकाज में पानी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती हैं, सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। छोटे बच्चों के लिए यह खतरा और गंभीर है। बुजुर्गों की कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के चलते मामूली संक्रमण भी जानलेवा बन सकता है। बच्चों के दूषित पानी से बार-बार बीमार पड़ने पर पढ़ाई प्रभावित होती है। स्कूल छूटते हैं, दवाइयों पर खर्च बढ़ता है। युवा और कामकाजी वर्ग कहते हैं कि पानी भरने, उबालने और छानने में समय जाता है। कई लोग काम पर देर से पहुंचते हैं। वहीं महिलाओं की अलग पीड़ा है कि घर के काम, बच्चों की देखभाल और बीमारियों की चिंता का दोहरा बोझ उठाना पड़ रहा है। जबकि बुजुर्गों की शिकायत है कि बीमारियों का खतरा ज्यादा, इलाज महंगा और बार-बार अस्पताल का चक्कर लगाना पड़ता है। बिल भरते हैं, फिर भी सुविधाएं अधूरी सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन कॉलोनियों में रहने वाले लोग बिजली, पानी का बिल भरते हैं । कांशीराम कॉलोनी और मालवीय नगर दोनों इलाकों में अधिकांश परिवार नियमित रूप से बिजली और पानी का बिल जमा करते हैं। कई घरों में मीटर लगे हैं। जल टैक्स और अन्य नगर पालिका शुल्क भी वसूले जाते हैं। इसके बावजूद सुविधाओं की हालत यह है कि लोग डिब्बा के पानी पर निर्भर होने को मजबूर हैं या पानी को उबालकर पीते हैं। जहां से गुजरती पाइप लाइनें वहां साफ-सफाई नहीं रहती गोण्डा। साफ-सफाई की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। मुख्य सड़कों पर कभी-कभार सफाई दिख जाती है, लेकिन गलियों और अंदरूनी हिस्सों में गंदगी के ढेर लगे रहते हैं। नालियां अक्सर जाम रहती हैं। कई जगह अतिक्रमण के कारण सफाई कर्मी नालियों तक पहुंच ही नहीं पाते। दुकानों, ठेलों और अस्थायी निर्माणों ने नालों को ढंक दिया है। बारिश के समय यही नाले ओवरफ्लो होकर सड़कों पर गंदा पानी फैला देते हैं। वहीं गंदगी के लिए जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी है। नगर पालिका में नियमित सफाई, नालों की खुदाई और मरम्मत की जिम्मेदारी है वहीं जलकल विभाग के तहत पाइपलाइन की मरम्मत और सुरक्षित पेयजल आपूर्ति कराना है। जबकि स्थानीय प्रशासन को अतिक्रमण हटाना और नियमों का पालन कराना होता है। नागरिकों का जिम्मा है कि कूड़ा निर्धारित स्थान पर डालना और नालियों में कचरा न फेंकना। लेकिन जब समन्वय की कमी होती है, तो जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है और समस्या जस की तस बनी रहती है। बोले लोग ----------------- हमारे यहां नल खोलते ही बदबूदार पानी आता है। कई बार शिकायत की, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला। बच्चों को बाहर से पानी खरीदकर पिलाना पड़ रहा है। - राजेश पुरानी पाइपलाइन कभी भी फट जाती है। पानी में कीड़े तक आ जाते हैं। बीमार पड़ने पर इलाज का खर्च अलग से उठाना पड़ता है। सरकार के निर्देशों के बाद भी हालात नहीं बदले। - रिहान कम दबाव में पानी आता है और वही पानी गंदा होता है। मजबूरी में उसी से काम चलाना पड़ता है। कई बार लीकेज दिखाने पर भी कर्मचारी नहीं आते। सुधार नहीं हो पा रहा है। - सम्मयदीन हर बरसात में समस्या बढ़ जाती है। नाली का पानी पाइप में घुस जाता है। यह सीधे स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। शिकायतें करने के बावजूद कोई सुनने वाला नहीं है, कभी ठीक पानी आता है कभी गंदा। - मनोज बोले जिम्मेदार ------------- जर्जर पाइप लाइनों की पहचान कर ली गई है। प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत और प्रतिस्थापन का कार्य कराया जाएगा। जल गुणवत्ता की जांच भी नियमित कराई जाएगी। लापरवाही पर जिम्मेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। - विशाल कुमार, एसडीएम/प्रभारी ईओ पालिका गोण्डा

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