बोले गोण्डा : गहने गढ़ने वाले कारीगरों के हाथ से छिन रहा रोजगार

Mar 06, 2026 03:53 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, गोंडा
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Gonda News - सोने और चांदी के दामों में वृद्धि से आभूषण कारीगरों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है। मांग में कमी के कारण उन्हें उचित मेहनताना नहीं मिल रहा है। कारीगर आधुनिक मशीनों की कमी और सरकारी सहायता के अभाव में परेशान हैं। पारंपरिक डिजाइनों की मांग घट रही है, जिससे उन्हें रोजगार की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

बोले गोण्डा : गहने गढ़ने वाले कारीगरों के हाथ से छिन रहा रोजगार

सोने व चांदी के दाम में बेतहाशा वृद्धि से ग्राहक के साथ जिले में आभूषण बनाने वाले कारीगर भी परेशान हैं। उनका कहना है कि आभूषणों की मांग में कमी के चलते उन्हें आर्थिक तंगी और रोजगार की कमी से जूझना पड़ता है। हिन्दुस्तान के बोले गोंडा मुहिम में रगड़गंज बाजार में सर्राफा व्यवसाय से जुड़े लोगों ने कहा कि कारीगरों को वाजिब मेहनताना तक नहीं मिल पा रहा है। वजह साफ है कि नामचीन कंपनियों की आधुनिक मशीनों के सामने उनके बनाए आभूषण में फिनिशिंग की कमी रह जाती है। इन लोगों का कहना है कि आने वाले दिनों में जीविकोपार्जन के लिए कोई दूसरा काम तलाशना पड़ेगा।

बाजार के रामधन सोनी, सत्य प्रकाश सोनी आदि ने कहा कि पारंपरिक डिजाइन के बजाय हल्के आभूषणों की बढ़ती मांग हालात और जटिल होते जा रहे हैं। अगर हम लोगों को सरकारी इमदाद न मिली तो स्थिति बद से बदतर होती चली जाएगी। इन लोगों ने कहा कि सोने-चांदी के दामों में गिरावट की उम्मीद कम है। बहू बेटियों व अन्य महिलाओं की पसंद के गहने को गढ़ने वाले कारीगरों की जिंदगी से खुशियां दिन-ब-दिन कम होती जा रही हैं। नामचीन ज्वेलरी कंपनियों व मशीनीकरण की धमक से पुराने कारीगरों का काम लगातार कम होता जा रहा है। बदलते दौर में सुनार कारीगरों को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। एक तो आर्थिक तंगी के कारण उनके पास आभूषण डिजाइन करने के लिए आधुनिक मशीनें और टूल्स नहीं हैं। पुराने और परंपरागत तरीके से सोने के आभूषण बनाने में समय और मेहनत दोनों लगते हैं, लेकिन इस पर उन्हें उचित मेहनताना नहीं मिल पाता। इसके अलावा, अब बाजार में परंपरागत डिजाइनों की मांग घटने लगी है और लोग हल्के, डिज़ाइनर आभूषणों की ओर रुख कर रहे हैं। इसके लिए मशीनों की आवश्यकता है। लेकिन अधिक पैसे नहीं होने और सरकारी सहायता की कमी के कारण कारीगर इस बदलाव को नहीं अपना पा रहे हैं। कारीगरों का कहना है कि सरकार ने सुनार कारीगरों के लिए जो योजनाएं बनाई हैं, उनकी जानकारी बहुत कम लोगों तक पहुंच पाती है। योजना का प्रचार प्रसार बढ़ाना चाहिए जिससे कारीगरों को इसका लाभ मिल सके। कुछ कारीगरों के पास यदि रुपये होते भी हैं, तो उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि इन मशीनों को कहां से और कैसे खरीदा जाए। चढ़ता गया सोने का भाव पर नहीं बढ़ा मेहनताना: रगड़गंज बाजार ही नहीं जिला मुख्यालय के साथ खरगूपुर और करनैलगंज के कारीगरों के हाथों डिजाइन की गई ज्वेलरी की मांग सभी जगहों पर है। यह अपने बारीक काम और आकर्षक नक्काशी के लिए जाना जाता है। यहां के कारीगरों के हाथों से निकलने वाले गहनों में न केवल चमचमाती कटिंग होती है, बल्कि रंग-बिरंगी मीनाकारी और नेट वर्क की भी खूबसूरत बारीकियां देखने को मिलती हैं। इस सबके बावजूद यहां के कारीगर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। आभूषणों की चमक में कारीगरों के चेहरे का दर्द किसी को नहीं दिख रहा। दरअसल, आभूषणों की खूबसूरती उनके कारीगरों की अद्भुत कला में छिपी होती है, लेकिन इन कारीगरों की चमक अब आर्थिक तंगी के कारण कम होती जा रही है। सोने की कीमत डेढ़ लाख के आसपास पहुंच गई है। गहनों के मेकिंग चार्ज में भी ग्राहकों से 6.5 प्रतिशत तक लिया जाता है लेकिन कारीगरों को इसका महज दो प्रतिशत या उससे भी कम मिलता है। इस स्थिति ने कारीगरों की हालत दयनीय कर दी है। कारीगरों की मेहनत और कला का मूल्य उन्हें सही तरीके से नहीं मिल रहा। सोने के आभूषणों पर बारीक काम करना, मीनाकारी और चांदी की बारीक नक्काशी जैसी कला में विशेषज्ञता हासिल करने के बावजूद, उन्हें काम का उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। यही कारण है कि, जैसे ही सोने का रेट बढ़ा, वैसे ही इन कारीगरों की जिंदगी और मुश्किल हो गई। भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है। हर ज्वेलरी पर झलकती है कारीगर की मेहनत : बीते दो से तीन सालों में महिलाओं में भी हल्की और सस्ती ज्वेलरी की मांग बढ़ी है। हालांकि, इन डिजाइनों में भी कारीगरों की बेहतरीन मेहनत झलकती है, लेकिन इन डिजाइनों के लिए उन्हें भी ज्यादा पैसे की जरूरत होती है। लेकिन संसाधनों की कमी और महंगी मशीनों की अनुपलब्धता के कारण वे इस परिवर्तन के साथ नहीं चल पा रहे हैं।ओडीओपी का नहीं मिल रहा लाभ : रगड़गंज बाजार के कारीगरों ने कहा कि आलम यह है कि हमारे कई साथी बेरोजगार बैठकर समय बिता रहे हैं। कई कारीगरों के लिए तो यह स्थिति इतनी विकट हो गई है कि वे अपनी आजीविका चलाने के लिए ई-रिक्शा चलाने या रेहड़ी लगाकर अपने परिवार का पेट पालने पर मजबूर हो गए हैं। हम लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। काम मे मेहनत अधिक, सुरक्षा कमजिले के सराफा व्यापारियों और कारीगरों का कहना है कि बीते कुछ सालों से समस्याएं केवल आय तक सीमित नहीं हैं। घंटों झुककर बारीक काम करने से आंखों की रोशनी कमजोर होना, कमर और गर्दन दर्द, रसायनों के संपर्क से सांस संबंधी दिक्कतें आम हैं। अधिकतर कारीगर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। पेंशन, भविष्य निधि, नियमित स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं बहुत कम लोगों तक सीमित हैं।युवा पीढ़ी बना रही पुश्तैनी कारोबार से दूरी: सराफा कारोबारियों का कहना है कि आज नई पीढ़ी इस पेशे की ओर कम आकर्षित हो रही है। युवाओं का कहना है कि लंबा कार्य समय, सीमित आय और भविष्य की अनिश्चितता उन्हें अन्य रोजगार विकल्पों की ओर प्रेरित करती है। कई युवा केवल पारिवारिक परंपरा के कारण इस काम से जुड़े हैं। कुछ ने बेहतर आय की तलाश में शहरों या अन्य व्यवसायों की राह पकड़ी है। कारीगरों को डर है कि यदि यही रुझान रहा, तो आने वाले वर्षों में पारंपरिक कारीगरी का स्वरूप कमजोर पड़ सकता है।सोने-चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी से घटा कारोबारसराफा व्यापारियों और ग्राहकों का कहना है कि सोना-चांदी दोनों ही कीमती धातुओं की कीमतों में उछाल के कारण उपभोक्ता पहले की तरह भारी डिजाइन के गहने बनवाने से कतराते हैं। कई ग्राहक सिर्फ आवश्यक हल्के गहने बनवाने तक सीमित रहे हैं या खरीद को टाल रहे हैं। इससे बाजार में सिर्फ शादी-ब्याह के समय में थोड़ी बहुत मांग दिखती है। शादियों के लिए पारंपरिक भारी गहनों की मांग में भी कमी आई है। अगर कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रही तो छोटे खरीदार बाजार से दूरी बना सकते हैं।हुनरमंद हाथों की जमीनी हकीकत: जिले के बेलसर नगर पंचायत स्थित रगड़गंज बाजार में वर्षों से सोने-चांदी के आभूषण गढ़ने वाले कारीगर आज बदलते आर्थिक और तकनीकी दौर में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि शादी-विवाह के सीजन और त्योहारों के समय ऑर्डर बढ़ते हैं, लेकिन सामान्य महीनों में काम काफी कम हो जाता है। अधिकांश कारीगर रोज़ाना 8 से 10 घंटे तक काम करते हैं, फिर भी उनकी मासिक आय इतनी नहीं हो पाती कि वे भविष्य के लिए बचत कर सकें। लोगों का है कहनाहमारे जैसे सुनार कारीगरों को सरकार से मदद की सख्त जरूरत है। -भैया लाल सोनी सरकार ने सुनार कारीगरों के लिए जो योजनाएं चला रखी हैं, उनकी जानकारी नही हैं। -चंदन सोनी बेहतर डिजाइन बनाने के लिए नई मशीनों की जरूरत होती है, उसके लिए अधिक रुपये चाहिए। -रामधन रुपये होने के बावजूद मशीनों के बारे में पता ही नहीं चलता कि उसे कहां से खरीदा जाए। -सत्य प्रकाश सोनी बोले जिम्मेदार बेलसर नगर पंचायत के रगड़गंज बाजार समेत जिले के सर्राफा व्यापारियों और कारीगरों की समस्याओं के समाधान को लेकर अफसरों से वार्ता की जाएगी। सरकार की ओर से लागू योजनाओं का कारीगरों को लाभ दिलाया जाएगा। -अवधेश कुमार उर्फ मंजू सिंह, एमएलसी प्रस्तुति: रंजीत तिवारी/सच्चिदानंद शुक्ल/मथुरा प्रसाद

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