भीमापार में एक दिन बाद मनाई जाती है होली
Ghazipur News - भीमापार बाजार में होली का पर्व चैत्र कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है। यहाँ की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसमें पहले नृत्यांगनाएं होली पर नृत्य करती थीं। एक सिद्ध संत के श्राप के कारण रंग खेलने की परंपरा में बदलाव आया और अब होली का आनंद अगले दिन लिया जाता है।

सादात, हिन्दुस्तान संवाद। होलिका फाल्गुन पूर्णिमा को जलाई जाती है और इसके अगले दिन रंगभरी होली मनाई जाती है। लेकिन सादात ब्लाक के दक्षिणी छोर पर गांगी नदी किनारे बसे छोटे से बाजार भीमापार में पूरे देश से अलग ही रवायत और परंपरा चली आ रही है। पूरा देश जहाँ होली का आयोजन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को करता है तो भीमापार बाजार में ये पर्व चैत्र कृष्ण की द्वितीया तिथि को मनाने की परंपरा है और ये परंम्परा सदियों से चली आ रही है। इस परम्परा के बारे में लोगों के बीच कई तरह की किवदंतियां हैं। कुछ बातें सबसे खास हैं।
बुजुर्ग बताते हैं कि भीमापार बाजार में पहले नृत्यांगनाएं रहती थीं, जो होली के दिन आस-पास के गांवों में या जमींदारों/राजाओं के यहां जाकर नृत्य आदि करके लोगों का मनोरंजन करती थीं और होली के दूसरे दिन खूब उल्लास के साथ बाजार में होली खेलती थीं। जिसके बाद से यही परंपरा ही बन गई। वहीं दूसरी चर्चा ये है कि भीमापार गांव स्थित कृष्ण मंदिर पर सदियों पूर्व एक सिद्ध संत रहते थे। एक बार होली पर हुड़दंग करते हुए स्थानीय लोगों ने उन्हें भी रंगों से सराबोर कर दिया। जिसके बाद क्रोध में उन्होंने भीमापार के लोगों को श्राप दे दिया कि कोई भी होली पर रंग नहीं खेल पाएगा। जिसके बाद से ही होली के दिन रंग खेलना बंद हो गया। बताया जाता है कि कुछ लोगों ने इस प्रथा को बदलने का भी प्रयास किया लेकिन वो सफल नहीं हो सके और कुछ न कुछ अनिष्ट हो गया। इसके बाद से कोई हिम्मत भी नहीं करता। पूरी दुनिया से इतर भीमापार में होली के अगले दिन सभी होली खेलते हैं। होली के दूसरे दिन भीमापार की होली पर पूरे बाजार में कोई भी वाहन आदि नहीं चलते हैं। अगर कोई व्यक्ति अंजाने में भी बाजार में पहुंच गया तो लोग उसे रंगों से सराबोर कर देते हैं।
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