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गाजीपुर: बुराइयों से लोगों को दूर रखता है रोजा

गुनाहों की महफ़िलों से तौबा करने का एक मात्र सहारा रोजा है। इस मुबारक महीने में नेकियों की दरवाजे खुल जाते हैं। इसलिए अल्लाह पाक की इबादत करने के लिए हर मुसलमान को एक माह तक भूखे प्यासे रहने का एक समय मुकर्रर की गयी है। रमजान का रोज़ा फ़र्ज़ है,अगर किसी मजबूरी से रोजा छूट जाए,तो उसकी कज़ा जरूरी है। नगर के लोदीपुर मुहल्ला निवासी हाजी मुहम्मद तौहिद सिद्दिकी ने बचपन में रखे गये रोजा के बारे में बताया कि हम उम्र बच्चों के साथ रोजा रखने का अलग जुनून था। घर का माहौल भी शुरू से नमाजी होने के साथ रोजा रखने का पाबंदी रहे हैं। घर के सदस्यों को रोजा रखते व अफ्तार करते देख मुझे भी रोजा रखना पड़ता था। इस नेक काम में घर के बड़े बुजुर्ग के अलावा वालिद व वालदैन पग पग पर रोजा रखने से लेकर अख़लाकी बुराइयों से दूर रहने की भी नसीहत देते रहे हैं। 7 साल के उम्र से रोजा रखना व नमाज पढ़ने का आदि बन गया और आज भी उम्र बढ़ने के साथ रोजा रखने व तिलावत करने में कोई परेशानी नहीं हुई। रोज़े की हालत में बहुत सुकून मिलता है। सैयद अली हसन का कहना है कि अफतार का वक्त होने पर सभी रोजेदार या फिर किसी वजह से रोजा न रख पाया हो। सभी एक साथ तस्तरखान पर बैठ जाया करते थे। और जैसे ही मस्जिदों से अजान की सुनाई होने पर सबसे पहले बिस्मिल्ला कर खजुर खाकर रोजा खोल लिया जाता रहा है, जो आज भी कायम है। अफतार व सहरी में मिलने वाली पकवान का तो अफतार में आज भी वही चीज मिलता है,जो मुझे बचपन में मिलता था। कुछ पकवान में बढ़ोत्तरी हुई, जैसे पहले चना की घुघनी, पकौड़ा, खजुर,रहा करता था। आज के दौर में सूजी का हलवा, सेवईयां और सहरी में दूध के साथ अडडा, सीरमाल रोटी आदि मिल रहा है। रमजान महीने में हर देश का मुसलमान अल्लाह पाक की इबादत के लिए रोजा रखता है। क्यों कि रोज़े की हालत में रमजान के महीने में दिन रात में की जाने वाली इबादतों का शबाब भी बढ़ा दिया जाता है। हर नेकी का सवाब 10 से 70 गुना ज्यादा अता किया जाता है।

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  • Web Title:Ghazipur: Rosa keeps people away from evils