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गाजीपुर: पांच महत्वपूर्ण स्तम्भों में से एक है रोजा

इस्लाम के पांच महत्वपूर्ण स्तम्भों में से एक है रोजा। इसके महत्व के लिहाज से रोजा नमाज के बाद दूसरे स्थान पर आता है। इसलिए अल्लाह ने नमाज की तरह रोजे को भी हर बालिग मर्द और औरत पर फर्ज कर रखा है। नमाज की तरह रोजा के मामले में किसी को किसी तरह की कोइ छूट नहीं है। रोजे की शुरुआत फर्ज की आजान के पहले से होती है और सूरज डूबने यानी मगरीब की आजान के साथ ही रोजा मुकम्मल होता है। बाजार निवासी खुर्शीद खां ने बताया कि इस्लाम के साथ तमाम इबादतों की तरह रोजे के लिए भी नियत को पहली शर्त के तौर निर्धारित किया गया है। रोजे की नियत करना सबके लिए वाजिब है। जबुर्रना गांव निवासी गुफरान खां ने बताया कि हदीश में आया है कि जो लोग रमजान के महीने में ज्रिके खुदा और रसूल के साथ हाजिर होते हैं, खुदा उसके अमाल में एक-एक कदम के बदले बरस दिन की इबादत का सवाब दिलाता है। देवैथा गांव निवासी अबू बकर खां ने बताया कि रोजा सिर्फ भूखे पेट रहने का नाम नहीं है, बल्कि रोजा के दौरान अपने शरीर, मन और मस्तिष्क पर नियंत्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना भूखा रहना रमजान इमान की परीक्षा है। ऐसी कठीन परीक्षा हर कोइ देता है और अल्लाह की बारगाह में जाकर अपने को पाक साबित करता है। रक्सहां गांव के प्रधान अली हसन खां ने बताया कि जिन्दगी में आदमी को हर पल अपने इमान की परीक्षा देनी होती है और बताना पड़ता है किवह सच्चा है। अल्लाह तो सबकुछ जातना है, वह लोगों के कर्मों के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने हिसाब से कामों का फैसला करता है। अल्लाह के बंदों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी तमाम ख्वाहिशों और जरूरतों पर नियंत्रण रखे।

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  • Web Title:Ghazipur: Rosa is one of the five important pillars