बदलते समय में खत्म हो रही पुरानी परंपराएं, नहीं सुनाई देती ढोल की थाप
Gangapar News - सैदाबाद। फाल्गुन माह कब आया कब चला गया अब पता ही नहीं चलता है। पहले
फाल्गुन माह कब आया कब चला गया अब पता ही नहीं चलता है। पहले फाल्गुन का महीना आते ही जो उल्लास गांव-गांव में झरने की तरह बहता था, वह अब स्मृतियों की परतों में सिमटता नजर आ रहा है। धोकरी गांव की 110 वर्षीय छविराजी देवी व अन्य बुजुर्गों से होली के बारे में बात करने पर उनकी आंखे चमक उठती है। बताती है कि बसंत पंचमी के दिन ही होलिका दहन स्थल पर जाल रखा जाता था, जिसमें पांच गोबर के उपले और बेर की कांटेदार डाल शामिल होती थी। उसी दिन से फगुआ गीतों का सिलसिला आरंभ हो जाता था।
रोज शाम को खेत-खलिहान के काम से निवृत्त होकर गांव के लोग चौपाल पर इकट्ठा होते, ढोल-मजीरे की थाप पर देर रात तक फाग गाते और दिनभर की थकान को गीतों में बहा देते। फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन के बाद दूसरे गांवों के लोग गाजा-बाजा लेकर पहुंचते थे।होलिका की राख को श्रद्धा से माथे पर लगाया जाता, राख उड़ाई जाती और फिर पूरी मंडली फाग गाते हुए गांव स्थित देवस्थलों तक जाती थी।गुलाल-अबीर उड़ता, गले मिलकर साल भर के गिले-शिकवे मिटा दिए जाते। खोवा भरी गुझिया खिलाकर लोग खुले मन से प्रेम और अपनत्व का उत्सव मनाते।गांव के बुजुर्ग बताते है कि अब तो पता ही नहीं चलता कि होली कब आई और कब चली गई। पहले एक महीना फगुआ गाया जाता था। आज नई पीढ़ी मोबाइल पर गीत सुनकर ही त्योहार मना लेती है।उनका कहना है कि पहले होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं थी, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने का अवसर थी। गांव से बाहर गए लोग भी होली पर घर लौटना अपना धर्म समझते थे। सत्तर अस्सी के दशक से पहले गरीबी का दौर था।किसान सरसों, चना और मटर की फसल पकने का इंतजार करते थे। फसल बेचकर ही होली का सामान खरीदा जाता, बच्चों के लिए नए कपड़े और पिचकारी ली जाती। संसाधन कम थे, लेकिन मन में प्रेम और भाईचारा भरपूर था। भले ही गरीबी थी, पर इंसानियत जिंदा थी।वर्तमान समय में जहां फगुआ गीतों की परंपरा लुप्तप्राय हो रही है, वहीं होली का स्वरूप भी बदलता नजर आ रहा है। बड़ी संख्या में लोग रंग और रिश्तों के उत्सव के बजाय नशे की ओर झुकते दिखते हैं, जिससे भाईचारे की डोर कमजोर पड़ रही है।होली के रंग भले बदल गए हों, पर बुजुर्गों की आंखों में आज भी वही पुरानी होली सजीव है-जहां प्रेम, अपनापन और लोकगीतों की मिठास ही सबसे बड़ा उत्सव हुआ करती थी।
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