बोले प्रयागराज : मेहनत पर भारी पड़ा बाजार, मायूस आलू किसानों को अब सिर्फ बारिश की आस
Gangapar News - मऊआइमा सोरांव और फूलपुर तहसील के आलू किसानों के लिए यह सीजन आर्थिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। उत्पादन लागत 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि बाजार में आलू का मूल्य 750 से 1100...
मऊआइमा सोरांव और फूलपुर तहसील समेत पूरे प्रदेश के आलू किसानों के लिए यह सीजन आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। गोला और जी-फोर जैसी प्रमुख प्रजातियों की बोआई से लेकर कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने की कुल लागत जहां 1200 से 1300 प्रति क्विंटल के बीच बैठ रही है, वहीं बाजार में इनका भाव 750 से 1100 तक ही सीमित है। ऐसे में किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी, स्टोरेज शुल्क और परिवहन व्यय के कारण कुल खर्च काफी अधिक हो गया है। यही वजह है कि जब तक आलू का भाव ठीक-ठाक नहीं बढ़ेगा किसानों को नुकसान की भरपाई कर पाना मुश्किल ही होगा।
अब किसानों को सितंबर में बारिश बढ़ने और सब्जियों की आपूर्ति घटने और नई बोआई में देरी होने से ही आलू के दाम सुधार की उम्मीद है। ऐसा न हुआ तो किसानों को चौतरफा मार झेलनी पड़ जाएगी। आलू की खेती करने वाले किसान इस वर्ष घाटे की मार झेल रहे हैं। बोआई से लेकर कोल्ड स्टोरेज तक पहुंचाने की लागत 1200 से 1300 प्रति क्विंटल बैठ रही है, जबकि गोला प्रजाति के आलू की बिक्री कोल्ड स्टोरेज में महज 700 से 750 के बीच हो रही है। इससे किसानों को हर क्विंटल पर 500 तक का सीधा नुकसान हो रहा है। किसानों के मुताबिक गोला प्रजाति के आलू की बोआई, सिंचाई, खाद, मजदूरी आदि में 600 प्रति क्विंटल की लागत आती है। वहीं खेत से निकालने, ढुलाई, स्टोरिंग और मजदूरी आदि में भी लगभग 600 और खर्च हो जाते हैं। यानी कुल मिलाकर लागत 1200 से 1300 प्रति क्विंटल के बीच बैठती है। लेकिन कोल्ड स्टोरेज में यह आलू 700 से 750 में बिक रहा है। ऐसे में जो किसान इसे स्टोर कर बेहतर रेट की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें अब भारी घाटे का सौदा झेलना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी, स्टोरेज शुल्क और परिवहन व्यय के कारण कुल खर्च काफी अधिक हो गया है। इसके विपरीत, बाजार में मांग कमजोर है और व्यापारी वर्ग का नियंत्रण अधिक दिखाई देता है, जिससे भाव उम्मीद से नीचे हैं। किसानों और कृषि विशेषज्ञों की राय है कि सरकार को आलू जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी तय करना चाहिए, ताकि किसान को कम-से-कम अपनी लागत तो मिल सके और भाव का संकट हर साल दोहराया न जाए। जी-फोर प्रजाति में 300 का घाटा, अब भी 200 रुपये पीछे दूसरी ओर, जीफोर प्रजाति के आलू की खेत में लागत लगभग 700 बैठती है और कोल्ड स्टोरेज तक लाते-लाते यह बढ़कर 1300 प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है। अभी इसका बाजार भाव 1100 से 1150 चल रहा है, जिससे यदि उत्पादन सामान्य रहा हो तो किसान को 300 से 350 प्रति क्विंटल का घाटा लग रहा है। यानी जितनी अधिक पैदावार हुई है घाटा भी उतना ज्यादा झेलना पड़ रहा है। कुछ दिन पहले दाम 1050 तक पहुंच गया था, जो बढ़कर अब 1150 पहुंचा है। अगर बारिश ज्यादा दिन हुई तो दाम में बढ़ोतरी की उम्मीद है। अब मौसम पर टिकी हैं उम्मीदें किसानों को अब उम्मीद है कि सितंबर में बारिश अधिक होने और सब्जियों की पैदावार घटने और बोआई में देरी होने पर आलू के दाम बढ़ सकते हैं। फिलहाल वे इसी आस में बैठे हैं कि स्टोर में रखा आलू कुछ बेहतर रेट दे सके। हालांकि इस समय भी फुटकर आलू 25 से 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा है लेकिन अन्नदाता को बमुश्किल सिर्फ 11 रुपये मिल रहे हैं। आधे से अधिक दाम व्यापारियों और बिचौलियों के पास जा रहा है। व्यापारियों पर भाव कंट्रोल का आरोप किसानों का आरोप है कि पिछले साल तक लगभग 35 फीसदी आलू व्यापारियों के पास था, जिससे वे दाम तय कर लेते थे। लेकिन इस बार अधिकतर किसानों ने उम्मीद में खुद ही आलू स्टोर कर लिया, जिससे व्यापारियों के पास सिर्फ 5-10 प्रतिशत ही आलू गया। अब व्यापारी मनमाने तरीके से बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं और दाम गिरा दिए गए हैं। चिप्स बनाने की फैक्ट्री बन सकती है किसानों की नई उम्मीद किसानों का कहना है कि हर बार इस घाटे को किस्मत मानकर बैठ जाना ही विकल्प नहीं है। बदलते समय के साथ अब किसानों को अपनी फसल को सीधे बाजार में बेचने की बजाय उसका मूल्य संवर्धन करने की ओर सोचना होगा। इस दिशा में आलू प्रोसेसिंग यूनिट, खासतौर पर चिप्स बनाने की फैक्ट्री एक बेहतर उपाय हो सकता है। गांव स्तर पर ही आलू से चिप्स, वेफर्स या फ्रेंच फ्राइज बनाने की यूनिट लगाए जा सकते हैं। इसकी जरूरी मशीनें आलू छीलने वाली, काटने वाली, तलने वाली और पैकिंग यूनिट आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं। इस तरह की फैक्ट्री ना केवल किसानों को आलू के गिरते दामों से बचाएगी, बल्कि उनकी उपज को एक स्थायी आमदनी का जरिया भी बना सकती है। जरूरत सिर्फ पहल करने की है। सरकार युवाओं को प्रोत्साहित करे किसानों को दाम मिलने के साथ ही युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। बोले जिम्मेदार सरकार किसानों की समस्याओं को दूर करने और आय बढ़ाने का काम कर रही है। किसानों की हर छोटी-बड़ी समस्या को उचित पटल पर रखा जाएगा। विभाग के मंत्रालय से लगातार संवाद स्थापित कर उन्हें किसानों की वास्तविक परिस्थितियों और कठिनाइयों से अवगत कराया जाएगा, ताकि समय रहते ठोस समाधान निकल सके। क्षेत्रीय लोगों और प्रदेशवासियों को हरसंभव सहुलियत उपलब्ध कराना हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए शासन स्तर से निरंतर योजनाबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिले, कृषि उत्पादन लागत कम हो और उनकी आय में वास्तविक बढ़ोतरी हो। किसानों के हितों की रक्षा करना और उन्हें आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। — सुरेन्द्र चौधरी, एमएलसी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा तो किया था, लेकिन आलू और टमाटर जैसी फसलों की मौजूदा स्थिति बेहद चिंताजनक है। किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्हें उत्पादन लागत भी अपनी जेब से उठानी पड़ रही है। ऐसे हालात में ज़रूरी है कि आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाए। स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जाए और सरकार किसानों की पैदावार का उचित मूल्य सुनिश्चित करने की ठोस पहल करे। यह मांग सरकार के सामने रखी जाएगी और क्षेत्र में चिप्स, सॉस, अचार जैसे उत्पादों के लिए फैक्ट्री लगाने की योजना पर बल दिया जाएगा, ताकि किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य मिल सके और स्थानीय युवाओं को भी रोजगार के अवसर प्राप्त हों। – इम्तियाज समी, ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि मऊआइमा -------------------- हमारी भी सुनें आलू किसान बोआई का रकबा घटाएं और उसकी जगह दूसरी फसलें लें। इससे आलू की पैदावार कम होगी तो दाम भी बेहतर मिलेंगे। – राकेश कुमार पटेल, चकश्याम किसानों को चाहिए कि आलू का उत्पादन घटाएं। जब मांग ज्यादा और माल कम होगा तो दाम कई गुना तक बढ़ सकते हैं। कम मेहनत में ज्यादा फायदा मिलेगा। – रामपाल पटेल, क्षमा का पूरा आलू जैसी सब्जियों पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना चाहिए, जैसे गेहूं और धान पर मिलता है। इससे किसानों को नुकसान से बचाव होगा और उपज का पक्का दाम मिलेगा। – राणा प्रताप सिंह, हिछवापुर किसानों से आलू की खरीद की जिम्मेदारी एफसीआई जैसे निकाय को दी जानी चाहिए। अभी मंडियों में आढ़तियों की मनमानी चलती है और किसान अपनी मेहनत का सही दाम नहीं पाते। – जगदंबा पटेल, गहरपुर मलकिया हर मंडी में डिजिटल रेट बोर्ड होना चाहिए, ताकि किसान ऑनलाइन दाम देख सकें। भाव छुपाने या धोखाधड़ी करने वाले व्यापारियों पर कार्रवाई हो। देशभर में आलू की एक समान कीमत तय होनी चाहिए। –अशोक कुमार पटेल छमा का पूरा मऊआइमा गांवों में आलू चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और स्टार्च बनाने की प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाएं। इससे सीजन के बाद भी मांग बनी रहेगी, किसानों को उचित दाम मिलेगा और युवाओं को रोजगार भी। – कामरान अहमद, सराय सुल्तान फुटकर बाजार में आलू 25 रुपये किलो बिक रहा है, लेकिन किसानों को 1100 रुपये क्विंटल और व्यापारी स्टोर से निकालकर 1400 रुपये क्विंटल कमा रहे हैं। यह असमानता खत्म होनी चाहिए। – अनिल यादव, कटरा दयाराम मऊआइमा हर साल किसान दाम की अनिश्चितता से परेशान रहते हैं। बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर खर्च करने के बाद फसल बाजार और किस्मत पर निर्भर हो जाती है। सरकार को इस समस्या पर ध्यान देना जरूरी है। – राममूरत यादव, किसान
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