
बोले प्रयागराज : पूस की बर्फीली हवाओं और कोहरे के बीच मचान पर कट रही किसानों की रात
Gangapar News - किसान ठंड में खेतों में जागकर अपनी फसलों की रक्षा कर रहे हैं। नीलगाय और आवारा पशुओं की समस्या ने उनकी मेहनत को खतरे में डाल दिया है। फसल बोने से लेकर कटाई तक, किसान हर कदम पर संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी योजनाओं की कमी और पशुओं की बढ़ती संख्या ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
किसानों का दर्द कड़ाके की ठंड, कोहरे से ढंके खेत, सन्नाटे को चीरती सर्द हवाएं और खुले आसमान के नीचे मचान पर बैठकर फसलों को बचाने की जद्दोजहद किसानों की नीयति बन चुकी है। यह कोई दृश्य मात्र नहीं, बल्कि आज के किसान की हकीकत है। जब शहरों में लोग रजाइयों और ब्लोअर की गर्मी से ठंड से बचने की कोशिश कर रहे हैं, तब गांवों में किसान अपनी फसलों की रखवाली करते हुए पूरी रात खेतों में जागने को मजबूर हैं। उनकी यह मजबूरी कोई नई नहीं है। छुट्टा जानवरों से फसलों को बचाने की उनकी शिकायतों को लगातार नजरअंदाज किया गया जिससे उनके सामने अपनी फसलों को खुद बचाने के सिवा कोई और रास्ता भी नहीं है।
पूस की सर्द रात में किसान घोर गरीबी और व्यवस्था के बोझ तले अपने फसल की रखवाली के प्रति विवश होकर ठंड से ठिठुरता रहता है। अक्सर अपने पेट और शरीर को गरम रखने के लिए आग जलाता है, पर अंततः नीलगायों और छुट्टा जानवरों द्वारा फसल बर्बाद होने पर भी नींद और आलस्य के कारण उठ नहीं पाता। इसीलिए खेतों में मचान बनाकर अपने फसलों की रखवाली जान जोखिम में डालकर करता है। फूलपुर के ग्रामीण इलाके के किसानों के लिए पूस का महीना हमेशा से कठिन रहा है, लेकिन इस बार हालात और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। फसल बोने से लेकर तैयार होने तक किसान को हर कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है। कभी डीएपी खाद की किल्लत ने किसानों को लाइन में खड़ा कर दिया, तो कभी सिंचाई के लिए बिजली और पानी की मार झेलनी पड़ी। इन सब मुश्किलों के बाद जब फसल लहलहाने लगी, तब एक नई मुसीबत ने सिर उठा लिया नीलगाय और आवारा पशुओं का आतंक। रात ढलते ही खेतों में खतरा मंडराने लगता है। झुंड के झुंड नीलगाय और बेसहारा पशु फसलों को रौंद डालते हैं। महीनों की मेहनत, कर्ज लेकर की गई खेती और परिवार की उम्मीदें एक ही रात में बर्बाद हो सकती हैं। इसी डर से किसान रात में घर लौटने की बजाय खेतों में मचान बनाकर पहरा दे रहे हैं। किसान रामस्वरूप बताते हैं, दिनभर खेत में काम करने के बाद शरीर जवाब दे देता है, लेकिन रात में घर जाने का साहस नहीं होता। अगर एक रात भी खेत छोड़ दिया, तो फसल चौपट हो सकती है। मचान पर बैठकर अलाव जलाना, कभी टॉर्च जलाना तो कभी लाठी पीटकर पशुओं को भगाना यही उनकी रात की दिनचर्या बन गई है। इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में किसान सिर्फ ठंड से ही नहीं जूझ रहा, बल्कि नींद, स्वास्थ्य और सुरक्षा से भी समझौता कर रहा है। कई किसान बुजुर्ग हैं, कई युवा हैं जिनके हाथों में खेती की जिम्मेदारी है। खुले आसमान के नीचे रात बिताने से सर्दी, खांसी, बुखार जैसी बीमारियां आम हो गई हैं, लेकिन इलाज से ज्यादा जरूरी उन्हें अपनी फसल की चिंता है। महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। कई गांवों में महिलाएं भी अपने पति और परिवार के साथ खेतों में रात गुजार रही हैं। बच्चों को घर छोड़कर माता-पिता का खेतों में पहरा देना गांव की सामाजिक तस्वीर को भी झकझोर रहा है। किसान कहते हैं कि अगर पशुओं से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते, तो उन्हें इस तरह जान जोखिम में डालकर रातें नहीं काटनी पड़तीं। सरकारी योजनाओं और दावों के बीच यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर अन्नदाता को अपनी फसल बचाने के लिए इस कदर संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? नीलगाय और आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, गोशालाओं की कमी और प्रभावी रोकथाम के अभाव ने किसानों की परेशानी को कई गुना बढ़ा दिया है। आज खेतों में जलते अलाव सिर्फ ठंड से बचने के लिए नहीं, बल्कि सिस्टम की उदासीनता के खिलाफ किसानों की खामोश गवाही भी हैं। मचान पर बैठा हर किसान इस उम्मीद में रात काट रहा है कि सुबह उसकी फसल सुरक्षित मिलेगी। यही वह जज्बा है, जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद किसान को खेत से जोड़े हुए है। पूस की यह रातें भले ही ठंडी और लंबी हों, लेकिन किसान की उम्मीद अब भी जिंदा है कि एक दिन उसकी मेहनत को सुरक्षा और सम्मान दोनों मिलेंगे। रात में सिंचाई बनी बड़ी चुनौती नहर से सिंचाई हो या ट्यूबवेल से किसानों के लिए बड़ी चुनौती है। बिना चप्पल पानी में खड़ा रहना पड़ता है। अगर छोड़ कर हटे तो दो खतरा है। पहला कोई दूसरा किसान अपने खेत में चोरी से पानी खोल देगा। दूसरा जरूरत से ज्यादा पानी खेत में लग गया तो फसल बर्बाद होने का बड़ा खतरा रहता है। गेहूं के छोटे पौधे में 12 घंटे से अधिक पानी, सरसों में आठ घंटे, अरहर, मटर, चना आदि में छह घंटे भी पानी रुका तो फसल बर्बाद होना निश्चित है। इस लिए ठंडी में सिंचाई का निगरानी किसानों के लिए बड़ी चुनौती है। अनाज घर पहुंचाना भी किसी संघर्ष से कम नहीं फसल तैयार होने के बाद अनाज घर पहुंच जाए तब किसान राहत की सांस लेता है। फसल काटने के बाद मड़ाई तक किसान को खेत में ही रहना पड़ता है। रुदापुर के किसान अमित, बाबूगंज के रामजी पटेल आदि ने बताया कि कई बार खेत से मड़ाई के लिए रखे गेहूं, सरसों के बोझ गायब हो जाते है जिसका एफआईआर न किसान कराने जाता है और अगर पहुंचा तो पुलिस करती भी नहीं। खलिहान से गेहूं का बोझ अगर गायब हो गया तो किसान अपने आप को माफ नहीं कर पाता है। इस लिए रात भर ठंड में भी डटा रहता है। गोशाला के बावजूद सड़क से खेत तक दिखते गोवंश कान्हा गोआश्रय स्थल के अलावा बाहर सड़क से खेत तक टहल रहे है गोवंश। खेत में फसल चट कर रहे है तो सड़क पर दुर्घटना का कारण बन रहे है। कपसा, ढकपुरा, सावड़ीह, उदयीपुर, पतुलकी, कनेहटी, बहादुरगढ़, मुबारकपुर आदि कुल फूलपुर में नौ कान्हा गोआश्रय स्थल है जहां 985 पशु मौजूद हैं। गोशाला के गोपालक की मनमानी से सड़क और खेत में आवारा पशु दिखते है। बोले जिम्मेदार फूलपुर के सेहुआडीह गांव की गोशाला में पशुओं की मौत के मामले की जांच कराई जा रही है। कान्हा गोशालाओं में ठंड से बचाव के लिए इंतजाम किए जाने के निर्देश जारी किए गए हैं। यदि कहीं भी किसी प्रकार की कोई लापरवाही जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा की जा रही है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। किसानों की सिंचाई विभाग से संबंधित समस्या की जानकारी है। अभी नहर में पानी आया था। फिर कोई दिक्कत आएगी तो निराकरण किया जाएगा। कहीं कहीं एक दो छुट्टा मवेशी दिख रहे है उन्हें भी गोशालाओं में पहुंचाने का इंतजाम किया जा रहा है। - जूही प्रसाद, उप जिलाधिकारी, फूलपुर हमारी भी सुनें कान्हा गोआश्रय स्थल सरकार की किसानों के हित में अति महत्वपूर्ण योजना ही नहीं योगी बाबा का ड्रीम प्रोजेक्ट है। सरकार की सभी योजनाएं जनोपयोगी ही होती हैं। कोई भी योजना जनता के नुकसान करने के उद्देश्य से नहीं बनाई जाती। उसको व्यवहारिक रूप देना या कहे कि उसको लागू करवाना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अधिकारियों की मनमानी के चलते गोशाला ही नहीं कई योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहीं है। इसकी मॉनिटरिंग होनी चाहिए। -अभिशांत पांडेय, युवा किसान, बेरूई जब चुनाव आता है तो सभी पार्टी के नेता ऐसा वादा करते हैं जैसे सरकार बनाने के बाद पहला काम किसानों को धनकुबेर बना देंगे। लेकिन जैसे ही शपथ ग्रहण हुआ किसानों के भविष्य पर ग्रहण लगना शुरू हो जाता है। सरकारें किसानों की भलाई के लिए बनती है। भोले भाले किसानों से वोट लेने के बाद उन्हें बाजारवाद के हवाले कर देते है। डीएपी के लिए लाइन से लेकर कही कही पुलिस की लाठी तक, उसके बात मिलावटी बीज, कीटनाशक के लिए चक्कर काटते हैं। -जगदीश नारायण तिवारी, किसान, रुदापुर इस महंगाई में खाद, पानी, बीज, जुताई, कीटनाशक से फसल लहलहाई तो आवारा पशुओं और नील गाय से बचाना बड़ी चुनौती है। इतना पैसा तो हर किसान के पास नहीं है कि बाड़ बनवाएं, कुछ नहीं मिला तो घर की पुरानी साड़ी निकाल कर बड़ा बना दिया। बताया कि दस बिस्वा खेत के लिए केवल दो तरफ से घेरा बनाने में 18 साड़ी लगी है। इतनी ही और चाहिए। इसमें तीन साड़ी नई है। फसल काटने के बाद फिर धुल कर पहने के काम आ जाएगी। -मिथिलेश कुमारी, चन्दौकी, फूलपुर गांव में गोशाला होना दुर्भाग्य है। परेशान किसान अलग अलग गांव से पशु लेकर आते है। गोशाल वाले अगर नहीं लिए तो हताश किसान उन जानवरों को वापस अपने साथ नहीं ले जाते। वो गोशाला के बाहर या कुछ दूर ले जाकर छोड़ देते है। वो आवारा पशु गांव के आस पास बागों में डेरा जामा लेते है। ये झुंड रात विरात जिस किसान के खेत में पहुंच गए उस किसान का भविष्य बर्बाद कर देते है। -लोक बहादुर गोंड, किसान, अमोलवा ठंड उनके लिए है जो घर में है। हमारा क्या ठंड हो, गर्मी हो, बरसात हो, बिजली कड़कती हो, ओला गिरता हो इन प्राकृतिक आपदाओं पर भारी पड़ता है आवारा पशुओं और नील गायों का आतंक। इनसे फसल को बचाना है तो भीषण ठंडी और कोहरा नहीं अपनी फसल और उसकी सुरक्षा ही दिखाई दे रही है। पूस या माघ का महीना मायने नहीं रखता। -अवधेश यादव, किसान, दरियापुर गोशाला बनाई तो गई लेकिन वहां भी पशुओं को भरपेट भूसा, हरा चारा, चुनी चोकर नहीं मिल पा रहा है। कुछ गोशाल छोड़ दिया जाय तो अधिकांश पर भूसा, चुनी चोकर अधिकारियों को दिखाना और अभिलेखों में दर्ज होने तक सीमित है वो पशुओं तक नहीं पहुंच पा रहा है। जिसके कारण पशु बाड़े से निकल कर किसानों का भविष्य चौपट कर रहे है। -डीपी शुक्ला, किसान, देवनहरी जब से ठंड शुरू हुई तब से किसान बाहर ही तो है। नवंबर की शुरुआत में डीएपी के लिए दर दर भटका, रातभर कतार में खड़ा रहा। डीएपी मिली तो बोआई करने के बाद फसल मिट्टी से ऊपर निकली नहीं कि निगरानी शुरू हुई। अब फसल काटने के बाद ही आराम मिलेगा। पूस की रात ही क्यों कार्तिक,अगहन, पूस, माघ पूरी ठंडी सिंचाई, निगरानी के लिए सिर्फ मचान ही सहारा है। -प्रमोद त्रिपाठी आजाद, नीबी किसानों की समस्या गंभीर समस्या है। इसके लिए जनप्रतिनिधियों को आवाज उठानी होगी। फसल सुरक्षा के लिए किसान रात रात भर जागता है। जो सक्षम है वही योजनाओं का लाभ भी उठाता है। सरकार की योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे इस पर बात होनी चाहिए। जिस देश का अन्नदाता ही परेशान हो उसे विकसित तो दूर विकासशील पर प्रश्न उठाना स्वाभाविक है। -अजय सिंह, किसान, फाफामऊ किसानों की हालत सुधारने के लिए सभी पार्टियों को आवाज उठानी होगी। सभी उनके उत्थान के साथ आर्थिक मजबूती की बात करते है लेकिन सत्ता में आते ही सुर बदल जाते है। किसानों के आर्थिक स्थिति सुधारनी है तो किसानों की तीन श्रेणियां बनाई जाय सक्षम, सीमांत और लघु किसान। श्रेणी के अनुरूप योजनाएं बनाकर उन्हें संसाधन उपलब्ध कराए बिना इनकी स्थिति नहीं सुधारी जा सकती। -संगीता पटेल, सामाजिक कार्यकर्ता समय से नहर में पानी नहीं आता किसान अधिकारियों की गणेश परिक्रमा करते करते थक हार कर ट्यूबल या पंपिंग सेट से सिंचाई के लिए मंहगे दाम पर पानी खरीदता है। इसके बावजूद अगर परीक्षणयुक्त बीज नहीं मिला तो चार महीने हाड़तोड़ मेहनत के बाद मनचाह उत्पादन नहीं होने पर ठगा महसूस करता है जो उसके और उसके परिवार पर भारी पड़ता है। यूरिया, डीएपी, कीटनाशक के लिए चाहे रबी हो खरीफ हो या जायद दर दर ठोकर खाना उसकी नियति बन गई है। -आशुतोष तिवारी, युवा किसान रुदापुर नहर से किसानों को समय से पानी नहीं मिल रहा है इसकी शिकायत मिली है। सिंचाई विभाग के अधिकारियों से बात कर समस्या का हल निकाला जाएगा। अगर जरूरी हुआ तो जिलाधिकारी से भी बात कर किसानों की समस्या का समाधान किया जायेगा। -अशोक चौधरी, सदस्य, निगरानी समिति, प्रयागराज

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