दियाली बेचकर गुज़ारे की आस लगाए बैठे कुम्हार
संक्षेप: Gangapar News - उरुवा,हिन्दुस्तान संवाद। दीपावली के पर्व पर जहाँ बाजारों में रंग-बिरंगी रौनक दिखाई दे रही है,

दीपावली के पर्व पर जहाँ बाजारों में रंग-बिरंगी रौनक दिखाई दे रही है, वहीं मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार अब भी अपने पुराने हुनर के दम पर अपनी रोज़ी-रोटी चलाने की कोशिश में लगे हैं। मगर इस बार उनके चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं दिख रही। उरुवा ब्लॉक स्थित समोगरा गांव के कुम्हारों का कहना है कि बाजार में सस्ते और आकर्षक चीनी दीयों व इलेक्ट्रिक लाइटों ने उनकी बिक्री पर असर डाला है। पिछले कुछ वर्षों से दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग घटती जा रही है, जिससे उनकी मेहनत का पूरा दाम नहीं मिल पाता। कुम्हार रामसुचित प्रजापति बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले इस बार बिक्री कम है।
दिये तैयार करने में हफ्तों की मेहनत लगती है, लेकिन ग्राहक अब प्लास्टिक और बिजली की लाइटें ज़्यादा पसंद करते हैं। अगर मौसम साथ दे और बाजार में भीड़ बढ़े तो थोड़ा मुनाफा हो सकता है, वरना घाटा होना तय है। कमला प्रजापति,जग्गालाल प्रजापति,रामलखन प्रजापति,अमरजीत प्रजापति,जंगीलाल प्रजापति,विमलेश प्रजापति सहित कई कुम्हारों ने बताया कि इस बार अच्छी मिट्टी और ईंधन (लकड़ी/कोयला) की कमी के कारण दीये तैयार करना मुश्किल हो गया। ऊपर से बारिश के मौसम ने सुखाने की प्रक्रिया में भी अड़चन डाली। मिट्टी महंगी हो गई है और रंग-सजावट के सामान की कीमत भी बढ़ने से परेशानी बढ़ी है। वहीं घर घर पहुंचाने पर भी दियाली की कीमत 50 से 60 रुपये सैकड़ा में बिक्री होती है कुम्हारों की व्यथा मिट्टी की कमी को लेकर कुम्हारों की व्यथा साफ झलकती है - कुम्हार शिव शंकर उर्फ चौबे प्रजापति,विवेक कुमार प्रजापति का कहना है कि हम किसी तरह अपनी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं, लेकिन अब ये धंधा सिर्फ गुज़ारा करने भर का रह गया है। अगर सरकार या समाज थोड़ा सहारा दे,तो मिट्टी का दिया फिर से हर घर की रोशनी बन सकता है।

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