चिंतनीय है होली का बदलता स्वरूप
Gangapar News - मांडा। आपसी प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा, उल्लास एवं रंगरास की प्रतीक होली पर्व का स्वरूप धीरे
आपसी प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा, उल्लास एवं रंगरास की प्रतीक होली पर्व का स्वरूप धीरे धीरे बदल रहा है। जहां कभी पखवाड़े भर पहले गांवों की चौपालों में फागुनी गीतों की गूंज घर-आंगन, खेत- सीवानों को अनुरंजित करती थी, वह भी अब सिमटती जा रही है। फागुनी गीतों का लोकरंग सहेजना बहुत जरूरी है, जिससे अपनी परंपरा और लोक संस्कृति के प्रतीक इस उल्लास पर्व की पहचान कायम रह सके। अपनी माटी व परिपाटी के गीतों के बदलते लोकरंग विषय पर शोधकार्य में लगे चर्चित हास्य कवि अशोक बेशरम ने होली के बदलते स्वरुप पर सोमवार को मांडा खास में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य ओंकारेश्वर प्रसाद द्विवेदी के आवास पर हुई एक बैठक में चिंता जाहिर करते हुए उक्त विचार व्यक्त किया।
कहा कि कभी आधे माघ से चैत मास तक होली का रंग जमता था, तो फागुन लगते ही फगुहारों की टोली शाम होते ही चौपालों में जुट जाती थी। इसी के साथ बसंती, बारहमासा, झूमर, बैसवारा, उलारा, धमाल, फगुआ, बेलवार, बेलवरिया, डेढ़ताल, ढाईताल, चैताल, कबीरा, गलियारा, रसिया जैसे मौसमी गीतों की धुन पर सभी झूम उठते थे। यह आलम अब नहीं दिखाई देता। गांवों में महीने भर पहले होलिका की सम्मत लगाई जाती थी, जहाँ गाँव के बच्चे और सयाने सभी मिलकर होलिका लगाते और एक गाँव से दूसरे गाँव की होलिका ऊंची करने की होड़ लगी रहती थी। अमवा में बौरा आये सखी, परदेसी बलमुआ न आये और तन मारत मदन दरेरा, पिया रहिगा, फागुन दिन थोरा, गवना लइजा मोरा - जैसे गीतों में हमारी सामाजिक परंपरा और लोकाचार के रंग उभरते थे। बैठक में तमाम प्रबुद्ध लोगों ने भी अपने विचार व्यक्त किये। अध्यक्षता बार एसोसिएशन मेजा के मंत्री अतुल वैभव द्विवेदी ने की।
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