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भारत के लिए जरूरी है तिब्बत की आजादी

भारत के लिए जरूरी है तिब्बत की आजादी

तिब्बत की आजादी भारत के लिए जरूरी है। यह मुद्दा देश की सुरक्षा से जुड़ा सामरिक महत्व का मुद्दा है। लेकिन अभी तक सरकारें इस मामले की अनदेखी करती रहीं हैं। तिब्बत को आजादी दिलाने के लिए हमें भारतीय जनमानस को जागरूक करना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि आजादी जितनी तिब्बत वासियों के लिए जरूरी है उतनी ही हम भारतीयों के लिए भी आवश्यक है। यह बात मंगलवार को नगर में आए भारत-तिब्बत सहयोग मंच युवा विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंजीनियर अरुण यादव ने कही। वे नगर में मीडिया कर्मियों से रूबरू थे। इस दौरान अरुण ने बताया कि एक समय तिब्बत को लेकर भारत में काफी सरगर्मियां थीं। जय प्रकाश नारायन, राम मनोहर लोहिया से लेकर दीन दयाल उपाध्याय तक इन विषयों को लेकर बहुत चिंतित थे। उन्होंने कहा कि पिछले 28 सालों से तिब्बत समस्या धीरे धीरे शांत हो रही थी। जो कि हमारे देश के नीति नियंताओं के ध्यान से भी निकल गई थी। उन्होंने कहा कि हम सभी लोगों को यह पता होना चाहिए कि चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। जिससे चीन हमारा पड़ोसी देश बन गया। जबकि नार्थ ईस्ट से लेकर नार्थ वेस्ट तक हमारी सीमाएं तिब्बत से लगतीं थीं। अरुणाचल प्रदेश से लेकर जम्मू-कश्मीर तक सीमा पर हम तिब्बत से जुड़े हुए थे। इधर चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और वह हमारा पड़ोसी देश बन गया। उस समय की भारत सरकार ने चीन से संधि कर उस कब्जे को स्वीकार कर लिया। इंजीनियर अरुण ने कहा कि 1959 में जब दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए उसके तीन साल बाद 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। तब हमारी सरकार हिन्दू चीनी भाई भाई के नारे लगा रही थी। इस युद्ध में हमारी एक लाख वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में चली गई। हालांकि युद्ध में हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। सीमित संसाधन होते हुए भी भारतीय सैनिकों ने वीरता का प्रदर्शन किया था। रेजांगला युद्ध में 114 भारतीय सैनिकों ने 1400 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। शहीद जसवंत सिंह ने अकेले ही 72 घंटे तक चीनी सेना को रोके रखा था। लेकिन सरकार की गलत नीतियों के चलते हमें पराजय ही हाथ लगी।

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  • Web Title:India needs Tibet s independence