लोकगीतों की विरासत बचाने में ‘संजीवनी’ पर भारी लापरवाही
Fatehpur News - फतेहपुर में लोकगीतों के संरक्षण के लिए वाद्ययंत्र योजना बनाई गई थी, लेकिन यह पंचायत स्तर पर लागू नहीं हो पाई। कई गांवों में ग्रामीण अभी भी इन यंत्रों के बारे में अनजान हैं, जबकि ये यंत्र धूल फांक रहे हैं। मोबाइल और आधुनिकता के कारण लोकगीतों की परंपरा समाप्त हो रही है।

फतेहपुर। बुआई कटाई से लेकर त्योहार उत्सवों में लोकगीत से गूंजते खेत गांव गुजरे जमाने की बात है। विरासत को बचाने के लिए संजीवनी बनकर उभरी वाद्ययंत्र योजना को पंचायते धरातल पर नहीं उतार पाई। दफ्तरों या कमरों में कैद यंत्र धूल फांक रहे है, यंत्रो से ग्रामीण अनिभिज्ञ है। इसी से गांवों में लोकगीतों की धुने विलुप्त होती जा रही है। दोआबा के गांवों में धार्मिक अनुष्ठानों, उत्सवों, मनोरंजन, दैनिक जीवन के कार्यो बुआई कटाई के दौरान वाद्य यंत्रों के साथ रसोई के बर्तन तक भूमिका निभाते थे। गुजरे जमाने में गांव, खेत खलिहान लोक और देवगीत गूंजते थे लेकिन मोबाइल और रील के समय से प्रथा विलुप्त होती जा रही है।
सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सांस्कृतिक निदेशालय द्वारा वित्तीय वर्ष में 13 ब्लॉक की 13 पंचायतों को वाद्ययंत्र बांटे लेकिन हकीकत यंत्र धूल फांक रहे है। चालू वित्तीय वर्ष की भी डिमांड आ चुकी है। जिसमें प्रत्येक ब्लॉकों से तीन तीन पंचायतों को चिंहित करते हुए 13 को चयनित कर लाभ दिया जाना है। चिंहित कराने से लेकर यंत्र उपलब्ध कराने तक की जिम्मेदारी विभागीय अफसरों द्वारा निभाई जाती है। कारण है कि पंचायतों के जिम्मेदार भी योजना को बढ़ावा देने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। वित्तीय वर्ष में धाता की खैरई, ऐरायां की बुदवन, हथगाम की संवत, विजयीपुर की गढ़ा, हसवां की रामपुर थरियांव, असोथर की सरकंडी, बहुआ की शाह, भिटौरा की जमरावां, तेलियानी की कोराई, मलवां की जाफराबाद, अमौली की चांदपुर, देवमई की सुजावलपुर, खजुहा की मंडराव को यंत्र मिले थे। इस बात की जानकारी ही ग्रामीणों को नहीं है।

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