65 वर्षीय वृद्धा के हाथ में परिवार के 28 सदस्यों की कमान
फतेहपुर में एक ऐसा परिवार है जिसमें 29 सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं। बुजुर्ग महिला हकीमुन्निशा खान परिवार की कमान संभालती हैं। परिवार के सदस्य एक साथ निर्णय लेते हैं, लेकिन आज के समय में परिवारों को एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। नौकरी और परिवार के बीच संतुलन बनाना भी मुश्किल हो रहा है।

फतेहपुर। तेजी से बदलती जीवनशैली के साथ बढ़ते सोशल मीडिया के प्रभाव के बीच संयुक्त परिवारों की कमान लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। परिवार के सदस्यों के बीच दूरियों के साथ रिश्तों की मजबूती को बनाए रखने में चुनौती आ रही है। आलम यह है कि कहीं एक ही छत के नीचे 29 लोग मिल जुलकर जीवन जी रहे हैं तो कहीं मोबाइल फोन अपनों के बीच दूरी बढ़ा रहा है। विश्व परिवार दिवस के मौके पर आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ ने ऐसे ही परिवार को खोजा जहां एक ही छत के नीचे 29 लोगो का परिवार मिल जुलकर रह रहा है। बदलते जमाने में आज भी दोआबा के शाह कस्बे में एक ऐसा ही परिवार मौजूद हैं जहां 29 सदस्यों का भारी भरकम परिवार एक ही छत के नीचे रहते हैं। एक ही रसोई में भोजन बनता है और हर छोटे-बड़े फैसले में भाई एक साथ बैठकर निर्णय लेते हैं हालांकि अंतिम निर्णय घर की बुजुर्ग महिला का होता है, कस्बे के रहने वाले स्व.मो.हिशाम खान सेना में हवलदार के पद पर थे जिन्होंने सन 1971 की लड़ाई भी लड़ी। उनकी मृत्यु के बाद परिवार की कमान उनकी पत्नी हकीमुन्निशा खान ने संभाली। उन्होंने अपने पुत्र रिजवान खान, इरफान खान, लल्लू पठान, फिरोज खान, शकील खान, उस्मान खान को ऐसी परवरिश दी कि उनकी तीसरी पीढ़ी तक एक ही छत के नीचे रह रहे हैं। उनके पुत्र लल्लू पठान ने बताया कि परिवार के सभी छह भाइयों की शादी होने के बाद क्रमश: पांच, तीन, दो, एक, दो व एक बच्चे भी हैं। उनके भतीजे इमरान की शादी होने के बाद उनका भी एक तीन माह का पुत्र है। बताया कि पिता के बाद परिवार की कमान भाई इमरान खान ने संभाली, जब भी कोई छोटा व बड़ा काम करना होता है तो सभी भाई एक साथ बैठकर निर्णय लेते हैं जिस पर मां की मुहर लगने के बाद ही काम आगे बढ़ता है। बताया कि सभी भाई जो भी काम करते हैं उसका पूरा धन भाई इमरान को दिया जाता है। जिससे वह बच्चों की पढ़ाई, दवा, कपड़े आदि की व्यवस्था करते हैं। जबकि कोई भाई सब्जी तो कोई राशन आदि की जिम्मेदारी उठाता है। साथ ही मां द्वारा समय-समय पर भोजन आदि बनाए जाने के लिए महिलाओं की ड्यूटी तय की जाती है। जिससे परिवार में कोई बिखराव नहीं हो सका। उनके परिवार के सदस्यों का मानना है कि एकजुट रहने से बच्चों में संस्कार बढ़ते हैं और मुश्किल समय में सभी एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।
संयुक्त परिवार से बढ़ता निजी फैसलों में दखल
नौकरी पेशा युवाओं का मानना है कि संयुक्त परिवार में रहने से कई बार निजी फैसलों में दखल बढ़ जाता है। करियर, नौकरी, समय और जीवनशैली को लेकर परिवार की अपेक्षाएं दबाव पैदा करती हैं। प्राइवेट नौकरी करने वाले अतुल कुमार ने बताया कि संयुक्त परिवार सुरक्षा और सहयोग देता है लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। वहीं रामबाबू ने बताया कि परिवार की जिम्मेदारियां साझा होने से तनाव कम होता है, लेकिन करियर को लेकर निर्णय नहीं लिए जा सकते।
परिवार को जोड़े रखना है बड़ी चुनौती
बदलते समय में परिवार को एकजुट रखना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो चुका है। रोजगार के लिए पलायन, आर्थिक दबाव और आने वाली पीढ़ियों की सोच में अंतर इसके बड़े कारण हैं। श्याम किशोर ने बताया कि कई बार छोटी-छोटी बातों पर परिवाद में विवाद बढ़ जाते हैं और परिवार के टूटने की स्थिति बन जाती है। उनका मानना है कि परिवार में संवाद और आपसी सम्मान खत्म होने से दूरियां बढ़ रही हैं। जिससे बच्चों में संस्कार की कमी होती जा रही है।
नौकरी और परिवार के बीच नहीं रहता संतुलन
आधुनिक दौर में कामकाजी माता-पिता के सामने परिवार और नौकरी के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है। नौकरी पेशा करने वाले युवाओं का मानना है कि सुबह से देर रात तक काम के दबाव से बच्चों और बुजुर्गों को पर्याप्त समय देना मुश्किल हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई, देखभाल, परिवार की जरूरतों के बीच समय बांटना आसान नहीं है। इसके बावजूद वे परिवार को प्राथमिकता देने की कोशिश की जाती है, परिवार के सहयोग से इस संतुलन को बनाए रखा जा सकता है।
बोली बुजुर्ग महिलाएं......
फोटो संख्या-12 राजदुलारी
पहले घर के साथ ही आस पड़ोस के बच्चे एक साथ घरों में खेलते थे बुजुर्गों के साथ बैठते थे। किस्से कहानियों को दौर चलता था बच्चे उसमें से ऐसे प्रश्न पूंछ लिया करते थे कि एक कहानी कभी दो तो कभी तीन दिनों तक चलती थी। लेकिन इस समय मोबाइल के दौर में छोटे व बडे बच्चे उसी में बिजी रहते हैं। जिससे परिवार बिखरते जा रहे हैं।
राजदुलारी, मीदसदन
फोटो संख्या- 13 सरस्वती साहू
पुराने दौर और आज के दौर में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। उस समय मोबाइल नहीं था तब परिवार के हर सदस्य के पास समय था आज मोबाइल के दौर में किसी के पास समय नहीं है। पहले मोहल्ले में बच्चों की किलकारियों के साथ ही शाम के समय छत में पड़ोसियों का जमावड़ा लगता था। जो आज काल्पनिक बन चुका है जिसका कारण मोबाइल है।
सरस्वती साहू, हसवा
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