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12 जुलाई, 2020|1:14|IST

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प्रवासियों को मनरेगा में नहीं भा रहा काम

प्रवासियों को मनरेगा में नहीं भा रहा काम

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना भले ही सरकार प्रवासियों के भविष्य के लिए बेहतर हथियार का दावा कर रही है मगर प्रवासियों को मनरेगा में काम नहंी भा रहा है। इसके पीछे कोई और बात नहीं बल्कि कम मजदूरी है। यही नहीं जो पढ़े लिखे लोग दिल्ली में सही सलामत रोजगार में लगे थे वे लोग कैसे मनरेगा के अंतर्गत खेतों में फावड़ा और नालों की सफाई कर पाएंगे। यह भी अपने आप में अहम सवाल है। प्रशासन के आंकड़ों के विपरीत जिले में दोगुने प्रवासी आ चुके हैं। जबकि यहां पर मनरेगा में रजिस्ट्रेशन की संख्या अभी तक 6 हजार ही पहुंची है। इसमें प्रवासियों के अलावा पहले से रह रहे लोग भी शामिल हैं। जिले मेंे पहले से ही 1 लाख 46 हजार जॉब कार्ड धारक हैं। इनमें 67 हजार एक्टिव जॉब कार्ड धारकों की संख्या है। लॉकडाउन के बाद जब प्रवासियों पर संकट आया तो सरकार ने मनरेगा पर विशेष रूप से फोकस किया। अभियान चलाकर जॉब कार्ड बनवाने पर पूरा जोर लगाया। इसके बाद भी जिले में ग्राम पंचायतों के प्रस्ताव पर महज संख्या छह हजार पहुंची है। वह भी पहले से यहां रह रहे लोगों को मिलाकर है। प्रशासन के आंकड़ों को माने तो जिले में अभी तक 31 हजार प्रवासी आ चुके हैं। जबकि करीब 25 हजार लोग ऐसे भी हैं जो कि चोरी छिपे गांव में पहुंच चुके हैं। जो प्रवासी दिल्ली में सही सलामत नौकरी कर रहे थे उनके लिए रोजगार तलाश करना काफी कठिन हो रहा है। बेहद ही मजबूर लोग जॉब कार्ड बनवाने के लिए प्रयासरत हैं। जॉब कार्ड बनवाने के लिए नियमित रोजगार का कोई प्रावधान नहंी है। ऐसे में मनरेगा के बजाय लोग दिहाड़ी मजदूरी करने में रुचि ले रहे हैं। मनरेगा में जहां 201 रुपए की मजदूरी है तो वहीं दिहाड़ी में 350 रुपए की मजदूरी मिलती है। यही वजह है कि बेहद ही मजबूर लोग मनरेगा की कम मजदूरी में काम करने को ज्यादा इच्छुक नहीं हैं।

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  • Web Title:Migrants are not interested in MNREGA work