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20 सितम्बर, 2020|11:19|IST

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डेरा डाले पीड़ितों की मुकिल में जिंदगी

डेरा डाले पीड़ितों की मुकिल में जिंदगी

तराई क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक गांव के लोग बाढ़ की विपदा से बेघर हो गए हैं। विपत्ति काल में उनकी मदद भी कोई करने वाला नहंी है। प्रशासन की ओर से जो मदद दी गई वह भी चंद दिनों में ही निपट गई। ऐसे में पीड़ितो को एक वक्त की रोटी की जुगाड़ करना काफी कठिन हो रहा है। शाहजहांपुर रोड पर करीब दो दर्जन से अधिक परिवार सड़क किनारे झोपड़ी डालकर रह रहे हैं। इनमें ऐसे परिवार हैं जिनका बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया।

कई परिवारों में सदस्यों की संख्या 8 से 10 है। ऐसे में इन परिवारों के सामने रोटी का जुगाड़ करना काफी मुश्किल हो रहा है। बाढ़ की वजह से काम धंधा भी नही मिल पा रहा है। प्रशासन की ओर से पिछले दिनों जो मदद दी गई उससे ज्यादा दिनों तक भला नही हो सका। पीड़ितों के सामने मजबूरी है कि वह आजीविका चलाने को आखिरकार करें तो क्या करें। पहले खेतों में काम मिल जाता था। अब खेतों में पानी लवालब भरा है। उनके सामने एक ही विकल्प बचा है कि रोजी रोटी के लिए शहर की ओर जाएं। डेरों में रह रहे पीड़ितों का कहना है कि रोजगार की छोड़िए उन्हें अपने बच्चों को लेकर काफी चिंता हो रही है। छोटे बच्चे दूध के लिए परेशान हो रहे हैं। मजबूरी में इधर उधर से दूध का जुगाड़ कर पानी बढ़़ाकर बच्चों की भूख को शांत किया जा रहा है। समेचीपुर, ढाईघाट पुल के पश्चिमी ओर कई परिवार डेरा डाले हैं। यहां भी राशन की दिक्कत है। बाए़ का दबाव अभी कम नहीं है। ऐसे में यह लेाग घरों की ओर नहीं लौट पा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गंगा जलस्तर कम होने में अभी वक्त लगेगा। एक एक दिन काटना काफी मुश्किल हो रहा है। प्रशासन भी उनकी मदद नहीं कर रहा है। जनप्रतिनिधियो ने तो बाढ़ में यहां आकर कोई हाल नहीं लिया।

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  • Web Title:Life in the case of camping victims