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फर्रुखाबाद कन्नौज

मनरेगा से टूट रही आस, रोजगार का ग्राफ गिरा

हिन्दुस्तान टीम,फर्रुखाबाद कन्नौजPublished By: Newswrap
Mon, 02 Aug 2021 04:20 AM
मनरेगा से टूट रही आस, रोजगार का ग्राफ गिरा

फर्रुखाबाद। संवाददाता

कोरोना काल में जिस तरीके से मनरेगा से जो रोजगार की आंस बंधी थी उस पर पानी सा फिर रहा है। मानसून सक्रिय न होने के बाद भी मनरेगा में काम की रफ्तार जिस तेजी के साथ चलनी चाहिए वह नहीं चल पा रही है। रोजगार का ग्राफ भी नीचे आ गया है। कई ब्लाकों में तो मनरेगा के काम में रोजगार का औसत बेहद कम है। जिम्मेदारों के जोर लगाने के बाद भी मनरेगा के कार्यो से जॉब कार्ड धारक नहीं जुड़ पा रहे हैं। कोरोना काल में जहां मनरेगा से रोजगार की आस बंधी थी। उस्रे परिणाम अब बेहतर नहीं दिख रहे हैं।

जिस तरह से पहले अफसरों ने काम दिए जाने को लेकर गंभीरता दिखाई थी अब उनकी बेरुखी नजर आ रही है। जो लोग पहले से बाहर से आए हुए थे वह लोग भी खाली हाथ हैं। इनमें तमाम लोग तो दूसरे धंधों में लग गए हैं। पूर्व मेें जरूर विशेष अभियान चलाकर रोजगार का ग्राफ बढ़ाने का काम किया गया था। एक समय तो रोजगार का ग्राफ बढ़कर एक दिन में 48 हजार तक हो गया था। उस समय शासन भी बेहद सख्त था। मौजूदा समय में सोख पिट, तालाब, रेन वाटर हार्वेस्टिग के अलावा प्लांटेशन पर काम चल रहा है। इतना सब कुछ काम होने के बाद भी मजदूरों की सख्या में काई इजाफा नहीं हो पा रहा है। मनरेगा में सबसे अधिक प्रधानों और सचिवों का घाल मेल चलता है। उनकी बगैर मर्जी के मनरेगा मेें पत्ता भी नहीं हिल सकता। मस्टर रोल फिल कराने के बाद प्रधान, सचिव अपने खासमखास जॉब कार्डधारको को इससे छूट दे देते हैं। सेटिंग गेटिंग का फार्मूला प्रभावी होता है स्थिति यह है कि कई मनरेगा मजदूरों से बेगार भी ली जाती है। ऐसी स्थिति में मनरेगा में जो काम गुणवत्तापूर्वक होना चाहिए भी नहींं हो पा रहा है। विभिन्न ग्राम पंचायतों में म नरेगा मजदूरी से दूरी बनाने का कारण भी साफतौर से दिख रहा है। क्योंकि इसमें मजदूरी बेहद कम है। कम मजदूरी होने की वजह से मजदूर दूसरे कामों में रुचि लेते हैं।

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