सावन के हर सोमवार काशी विश्वनाथ मंदिर में 2 घंटे मिलेगा बाबा का स्वरूप दर्शन, जानें डिटेल
इस साल सावन के पहले सोमवार पर 14 जुलाई को गर्भगृह में काशी विश्वनाथ, शिव स्वरूप में दर्शन देंगे। 21 को दूसरे सोमवार को शंकर-पार्वती की रजत प्रतिमा के दर्शन होंगे। 28 को तीसरे सोमवार पर भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में दर्शन देंगे। 4 अगस्त को बाबा का रुद्राक्ष शृंगार होगा।

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में कुछ ही अवसर ऐसे होते हैं जब गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के बजाय स्वरूप के दर्शन होते हैं। सावन के सभी सोमवार भी उन्हीं में शामिल हैं। आप बाबा के विविध स्वरूपों का दर्शन करना चाहते हैं तो रात में दरबार आएं। हर सोमवार को सिर्फ दो घंटे स्वरूप दर्शन मिलेंगे।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में शाम को होने वाली सप्तर्षि आरती के बाद शयन आरती आरंभ होने तक स्वरूप के दर्शन होंगे। सावन के सोमवार पर सप्तर्षि आरती 8 बजे समाप्त हो जाएगी। ऐसे में रात 8 बजे से 10 बजे तक इन स्वरूपों के दर्शन होंगे। पूर्व महंत परिवार के वरिष्ठ सदस्य पं. ज्योतिशंकर त्रिपाठी के अनुसार रानी अहिल्याबाई द्वारा 247 वर्ष पूर्व श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार के पहले से ही सावन के सोमवार पर बाबा के स्वरूप दर्शन की परंपरा चली आ रही है। इस वर्ष प्रथम सोमवार पर 14 जुलाई को गर्भगृह में काशी विश्वनाथ, शिव स्वरूप में दर्शन देंगे। 21 को दूसरे सोमवार को शंकर-पार्वती की रजत प्रतिमा के दर्शन होंगे। 28 को तीसरे सोमवार पर भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में दर्शन देंगे। 4 अगस्त को बाबा का रुद्राक्ष शृंगार होगा। शिव की पंचबदन प्रतिमा दर्शन के लिए रखी जाती है।
अर्द्धनारीश्वर
सप्तर्षियों को जो ज्ञान महादेव ने दिया उन्हीं 132 विधानों की अनुभूति देवी पार्वती को कराने के लिए प्रभु ने पार्वती को स्वयं में समाहित कर लिया था। इससे पूर्व पार्वती ने यह प्रश्न उठाया था कि 132 विधान ही क्यों? तपस्या के बाद भी वह नहीं जान सकीं। तब शिव ने अर्द्धनारीश्वर स्वरूप धारण किया।
रुद्राक्ष शृंगार
चौथे सोमवार को एक बार पुन: आदि योगी शिव की चल रजत प्रतिमा विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृ़ह में स्थान लेती है। भगवान के विग्रह से लेकर गर्भगृह और मंदिर के मुख्य मंडप को रुद्राक्ष से सजाया जाता है। रुद्राक्ष को जहां शिव की आंख कहा गया है वहीं इसकी उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं भी हैं।
शिव
आदि योगी ने शिव का रूप सप्तर्षियों को दीक्षित करने के लिए धारण किया था। इस स्वरूप में सदाशिव ने सप्तर्षि अर्थात् पुलस्थ, पुलह: क्रतु, अंगिरा, अत्रि, वशिष्ठ एवं अरुंधति को उन 132 विधानों का ज्ञान दिया जिनके अनुपालन से मानव जीवन की तमाम समस्याओं का निराकरण होता है।
शंकर-पार्वती
शंकर और पार्वती की युगल छवि को वैराग्य और दाम्पत्य के बीच संतुलित समन्वय का प्रतीक माना गया है। यह स्वरूप प्रकृति और पुरुष के संयमित एवं आदर्श स्थिति को भी दर्शाता है। देवाधिदेव इस स्वरूप के माध्यम से संसारियों को आदर्श जीवन के सूत्र भी उपलब्ध कराते हैं।

लेखक के बारे में
Ajay Singhअजय कुमार सिंह पिछले आठ वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में पूर्वांचल के बड़े हिस्से से खबरों का कोआर्डिनेशन देख रहे हैं। वह हिन्दुस्तान ग्रुप से 2010 से जुड़े हैं। पत्रकारिता में 27 वर्षों का लंबा अनुभव रखने वाले अजय ने टीवी, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। हिन्दुस्तान से पहले वह ईटीवी, इंडिया न्यूज और दैनिक जागरण के लिए अलग-अलग भूमिकाओं में काम कर चुके हैं। अजय राजनीति, क्राइम, सेहत, शिक्षा और पर्यावरण से जुड़ी खबरों को गहराई से कवर करते हैं। बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट अजय फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान में असिस्टेंट एडिटर हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति और क्राइम की खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं।
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